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Gulzar Shayari: गुलज़ार साहब की आज तक की सबसे मशहूर वो नज़्में जो छू लेंगी दिल को

Gulzar Shayari: गुलज़ार साहब की आज तक की सबसे मशहूर वो नज़्में जो छू लेंगी दिल को

सुकृता पॉल के शब्दों में ‘गुलज़ार साब अपनी नज़्मों में सीधे-सादे शब्दों से चौंका देेने वाली तस्वीरें गढ़ते हैं। कहीं तो पढ़ने वालों को अचानक काग़ज़ पर भारी-भरकम ख़याल दफनाये मिलते हैं और कहीं दिखाई देते हैं कर्ज़ की मिट्टी चबाते हुए किसान जो ख़ुदकुशी कर बैठते हैं। एक के बाद एक जैसी ये नन्ही मुन्नी नज़्में अंदर उतरती हैं जीने की लम्बी और गहरी कहानी आहिस्ते- आहिस्ते उभरने लगती है और फिर कोसों लम्बा सफ़र तय कर डालने का ढाढस मिलता है।’ पेश हैं गुलज़ार साहब की लिखी कुछ चुनिंदा नज़्में.............
 

आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख़ तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता आदमी बुलबुला है पानी का।


आज फिर चाँद की पेशानी से उठता है धुआँ
आज फिर महकी हुई रात में जलना होगा
आज फिर सीने में उलझी हुई वज़नी साँसें
फट के बस टूट ही जाएँगी, बिखर जाएँगी
आज फिर जागते गुज़रेगी तेरे ख्वाब में रात
आज फिर चाँद की पेशानी से उठता धुआँ

-गुलज़ार


दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म
जैसे जंगल में शाम के साये 
जाते-जाते सहम के रुक जाएँ 
मुडके देखे उदास राहों पर 
कैसे बुझते हुए उजालों में 
दूर तक धूल ही धूल उड़ती है


कंधे झुक जाते है जब बोझ से इस लम्बे सफ़र के 
हांफ जाता हूँ मैं जब चढ़ते हुए तेज चढाने 
सांसे रह जाती है जब सीने में एक गुच्छा हो कर
और लगता है दम टूट जायेगा यहीं पर 
एक नन्ही सी नज़्म मेरे सामने आ कर 
मुझ से कहती है मेरा हाथ पकड़ कर-मेरे शायर 
ला , मेरे कन्धों पे रख दे,
में तेरा बोझ उठा लूं 

-गुलज़ार


 


खाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ 
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ, फैलाया हुआ
ठोकरें खाता हुआ खाली लुढ़कता डिब्बा 
यूँ भी होता है कोई खाली-सा- बेकार-सा दिन 
ऐसा बेरंग-सा बेमानी-सा बेनाम-सा दिन


देखो आहिस्ता चलो,और भी आहिस्ता ज़रा
देखना,सोच-समझकर ज़रा पाँव रखना 
जोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में 
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जायें देखो
जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा

​​​​​​​-गुलज़ार


आओ तुमको उठा लूँ कंधों पर
तुम उचककर शरीर होठों से चूम लेना 
चूम लेना ये चाँद का माथा 
आज की रात देखा ना तुमने 
कैसे झुक-झुक के कोहनियों के बल
चाँद इतना करीब आया है


आओ फिर नज़्म कहें 
फिर किसी दर्द को सहलाकर सुजा ले आँखें 
फिर किसी दुखती हुई रग में छुपा दें नश्तर 
या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर एक बार 
नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज़ ही दें लें 
फिर कोई नज़्म कहें

​​​​​​​-गुलज़ार

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