Gorakh Pandey Poetry: मशहूर कवि गोरख पाण्डेय की वो बेहतरीन कवितायेँ जो दिखाती है लोगों का दर्द
गोरख पाण्डे हिन्दी साहित्य के उन कुछ गिने चुने नामों में से हैं जिन्होंने कविता लेखन की प्रचलित शैलियों से इतर, एक अलग अंदाज़ में लिखना चुना और अपनी कविताओं में आम लोगों के मुद्दों को विषय बनाया। सन 1945 में उत्तर प्रदेश के देवरिया में जन्में गोरख पाण्डे तुलनात्मक रूप से एक ठीक-ठाक आर्थिक स्थिति वाले परिवार से आते थे, लेकिन अपने आस-पास मौजूद जाति प्रथा के दमनकारी स्वरूप ने उन पर निश्चित ही एक गहरा असर छोड़ा होगा, जो उनकी कविताओं में साफ दिखता है।
गोरख पाण्डे के निजी जीवन के बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है, यह उनकी कविताएं ही हैं जो उनकी वैचारिक गहनता और साहित्यिक रचनात्मकता की झलक दे जाती हैं। उनके लिखे कई गीत और कविताएं सं-सामयिक जन-आंदोलनों में लोगों के विरोध, उनकी पीड़ा, और उनके गुस्से का स्वर बन जाते हैं। गोरख पांडेय आक्रोश के कवि हैं, उनके गीत संघर्ष के गीत हैं। उनकी रचनाओं में गरीबी, छुआछूत, भेदभाव और शोषण के खिलाफ आवाज है। गोरख पांडेय का मानना था कि कविता प्रमाणिक रूप से जनांदोलन की जमीन तैयार करती है, तो आईये आज आपको मिलाएं इनकी कुछ मशहूर कविताओं से....
नीले पीले सफेद चितकबरे लाल
रखते हैं राम लाल जी कई रुमाल
वे नहीं जानते किसने इन्हें बुना
जा कर कई दुकानों से ख़ुद इन्हें चुना
तह-पर -तह करते ख़ूब सम्हाल-सम्हाल
ऑफ़िस जाते जेबों में भर दो-चार
हैं नाक रगड़ते इनसे बारम्बार
जब बॉस डाँटता लेते एक निकाल
सब्ज़ी को लेकर बीवी पर बिगड़ें
या मुन्ने की माँगों पर बरस पड़ें
पलकों पर इन्हें फेरते हैं तत्काल
वे राजनीति से करते हैं परहेज़
भावुक हैं, पारटियों को गाली तेज़
दे देते हैं कोनों से पोंछ मलाल
गड़बड़ियों से आजिज़ भरते जब आह
रंगीन तहों से कोई तानाशाह
रच कर सुधार देते हैं हाल.
हमारी यादों में छटपटाते हैं
कारीगर के कटे हाथ
सच पर कटी ज़ुबानें चीखती हैं हमारी यादों में
हमारी यादों में तड़पता है
दीवारों में चिना हुआ
प्यार।
अत्याचारी के साथ लगातार
होने वाली मुठभेड़ों से
भरे हैं हमारे अनुभव।
यहीं पर
एक बूढ़ा माली
हमारे मृत्युग्रस्त सपनों में
फूल और उम्मीद
रख जाता है।
एक झीना-सा परदा था, परदा उठा
सामने थी दरख्तों की लहराती हरियालियाँ
झील में चाँद कश्ती चलाता हुआ
और खुशबू की बाँहों में लिपटे हुए फूल ही फूल थे
फिर तो सलमों-सितारों की साड़ी पहन
गोरी परियाँ कहीं से उतरने लगीं
उनकी पाजेब झन-झन झनकने लगी
हम बहकने लगे
अपनी नजरें नजारों में खोने लगीं
चाँदनी उँगलियों के पोरों पे खुलने लगी
उनके होंठ, अपने होठों में घुलने लगे
और पाजेब झन-झन झनकती रही
हम पीते रहे और बहकते रहे
जब तलक हर तरफ बेखुदी छा गई
हम न थे, तुम न थे
एक नगमा था पहलू में बजता हुआ
एक दरिया था सहरा में उमड़ा हुआ
बेखुदी थी कि अपने में डूबी हुई
एक परदा था झीना-सा, परदा गिरा
और आँखें खुलीं...
खुद के सूखे हलक में कसक-सी उठी
प्यास जोरों से महसूस होने लगी
ये जो मुल्क़ पे कहर-सा बरपा है
ये जो शहर पे आग-सा बरसा है
बोलो यह पंजा किसका है ?
यह ख़ूनी पंजा किसका है ?
पैट्रोल छिड़कता जिस्मों पर
हर जिस्म से लपटें उठवाता
हर ओर मचाता क़त्लेआम
आँसू और ख़ून में लहराता
पगड़ी उतारता हम सबकी
बूढ़ों का सहारा छिनवाता
सिन्दूर पोंछता बहुओं का
बच्चों के खिलौने लुटवाता
बोलो यह पंजा किसका है ?
यह ख़ूनी पंजा किसका है ?
सत्तर में कसा कलकत्ते पर
कुछ जवाँ उमंगों के नाते
कस गया मुल्क़ की गर्दन पर
पचहत्तर के आते आते
आसाम की गीली मिट्टी में
यह आग लगाता आया है
पंजाब के चप्पे-चप्पे पर
अब इसका फ़ौजी साया है
ये जो मुल्क़ पे कहर-सा बरपा है
ये जो शहर पे आग-सा बरसा है
बोलो यह पंजा किसका है ?
यह ख़ूनी पंजा किसका है ?
सरमाएदारी की गिरफ़्त
तानाशाही का परचम
ये इशारा जंगफ़रोशी का
तख़्ते की गोया कोई तिकड़म
यह जाल ग़रीबी का फैला
देसी मद में रूबल की अकड़
यह फ़िरकापरस्ती का निशान
भाईचारे पे पड़ा थप्पड़
ये जो मुल्क़ पे कहर-सा बरपा है
ये जो शहर पे आग-सा बरसा है
बोलो यह पंजा किसका है ?
यह ख़ूनी पंजा किसका है ?
यह पंजा नादिरशाह का है
यह पंजा हर हिटलर का है
ये जो शहर पे आग-सा बरसा है
यह पंजा हर ज़ालिम का है
ऐ लोगो ! इसे तोड़ो वरना
हर जिस्म के टुकड़े कर देगा
हर दिल के टुकड़े कर देगा
यह मुल्क के टुकड़े कर देगा
रोशनी और फ़ौलाद का मोर्चा
हम बनाएँगे जनवाद का मोर्चा
जिनकी बस्ती लुटी जिनकी ख़ुशियाँ लुटीं
उनकी ताक़त की ईजाद का मोर्चा
हम किसानों व मज़दूरों का मोर्चा
उगते सूरज का और चाँद का मोर्चा
कर्म से ज्ञान का, ज्ञान से मुक्ति का
मुक्ति से सबके संवाद का मोर्चा
सब लुटेरों, सभी ज़ालिमों के ख़िलाफ़
युद्ध के शंख के नाद का मोर्चा
एक दुनिया नई जो है गढ़ने चले
ऐसे सपनों की बुनियाद का मोर्चा
हम बनाएँगे जनवाद का मोर्चा
रोशनी और फ़ौलाद का मोर्चा
लोहे के पैरों में भारी बूट
कंधों से लटकती बंदूक
कानून अपना रास्ता पकड़ेगा
हथकड़ियाँ डाल कर हाथों में
तमाम ताकत से उन्हें
जेलों की ओर खींचता हुआ
गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से
श्रम से फल को अलग करता
रखता हुआ चीजों को
पहले से तय की हुई
जगहों पर
मसलन अपराधी को
न्यायाधीश की, गलत को सही की
और पूँजी के दलाल को
शासक की जगह पर
रखता हुआ
चलेगा
मजदूरों पर गोली की रफ्तार से
भुखमरी की रफ्तार से किसानों पर
विरोध की जुबान पर
चाकू की तरह चलेगा
व्याख्या नहीं देगा
बहते हुए खून की
व्याख्या कानून से परे कहा जाएगा
देखते-देखते
वह हमारी निगाहों और सपनों में
खौफ बन कर समा जाएगा
देश के नाम पर
जनता को गिरफ्तार करेगा
जनता के नाम पर
बेच देगा देश
सुरक्षा के नाम पर
असुरक्षित करेगा
अगर कभी वह आधी रात को
आपका दरवाजा खटखटाएगा
तो फिर समझिए कि आपका
पता नहीं चल पाएगा
खबरों से इसे मुठभेड़ कहा जाएगा
पैदा हो कर मिल्कियत की कोख से
बहसा जाएगा
संसद में और कचहरियों में
झूठ की सुनहली पालिश से
चमका कर
तब तक लोहे के पैरों
चलाया जाएगा कानून
जब तक तमाम ताकत से
तोड़ा नहीं जाएगा
जो हैं गरीब उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं जरूरतें तो मुसीबतें कम हैं
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा
हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं
वे नंगे रहते हैं बड़े मजे में
वे भूखों रह लेते हैं बड़े मजे में
हमको कपड़ों पर और चाहिए कपड़े
खाते-खाते अपनी नाकों में दम है
वे कभी कभी कानून भंग करते हैं
पर भले लोग हैं, ईश्वर से डरते हैं
जिसमें श्रद्धा या निष्ठा नहीं बची है
वह पशुओं से भी नीचा और अधम है
अपनी श्रद्धा भी धर्म चलाने में है
अपनी निष्ठा तो लाभ कमाने में है
ईश्वर है तो शांति, व्यवस्था भी है
ईश्वर से कम कुछ भी विध्वंस परम है
करते हैं त्याग गरीब स्वर्ग जाएँगे
मिट्टी के तन से मुक्ति वहीं पाएँगे
हम जो अमीर हैं सुविधा के बंदी हैं
लालच से अपने बंधे हरेक कदम हैं
इतने दुख में हम जीते जैसे-तैसे
हम नहीं चाहते गरीब हों हम जैसे
लालच न करें, हिंसा पर कभी न उतरें
हिंसा करनी हो तो दंगे क्या कम हैं
जो गरीब हैं उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं मुसीबतें, अमन चैन हरदम है
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा
हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं
रामजी राय से एक लोकगीत सुनकर
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
जोगी शिरीष तले
मुझे मिला
सिर्फ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में
आँखों में आकाश का सपना
पैरों में धूल और घाव
गाँव-गाँव वन-वन
भटकता है जोगी
जैसे ढूँढ रहा हो खोया हुआ प्यार
भूली-बिसरी सुधियों और
नामों को बाँसुरी पर टेरता
जोगी देखते ही भा गया मुझे
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
नहीं उसका कोई ठौर ठिकाना
नहीं ज़ात-पाँत
दर्द का एक राग
गाँवों और जंगलों को
गुंजाता भटकता है जोगी
कौन-सा दर्द है उसे माँ
क्या धरती पर उसे
कभी प्यार नहीं मिला?
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
ससुराल वाले आएँगे
लिए डोली-कहार बाजा-गाजा
बेशक़ीमती कपड़ों में भरे
दूल्हा राजा
हाथी-घोड़ा शान-शौकत
तुम संकोच मत करना, माँ
अगर वे गुस्सा हों मुझे न पाकर
तुमने बहुत सहा है
तुमने जाना है किस तरह
स्त्री का कलेजा पत्थर हो जाता है
स्त्री पत्थर हो जाती है
महल अटारी में सजाने के लायक
मैं एक हाड़-माँस क़ी स्त्री
नहीं हो पाऊँगी पत्थर
न ही माल-असबाब
तुम डोली सजा देना
उसमें काठ की पुतली रख देना
उसे चूनर भी ओढ़ा देना
और उनसे कहना-
लो, यह रही तुम्हारी दुलहन
मैं तो जोगी के साथ जाऊँगी, माँ
सुनो, वह फिर से बाँसुरी
बजा रहा है
सात सुरों में पुकार रहा है प्यार
भला मैं कैसे
मना कर सकती हूँ उसे ?
घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों में बंद खिड़कियाँ हैं
बंद खिड़कियों से टकराकर अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह
नई बहू है, घर की लक्ष्मी है
इनके सपनों की रानी है
कुल की इज्ज़त है
आधी दुनिया है
जहाँ अर्चना होती उसकी
वहाँ देवता रमते हैं
वह सीता है, सावित्री है
वह जननी है
स्वर्गादपि गरीयसी है
लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह
कानूनन समान है
वह स्वतंत्र भी है
बड़े-बड़ों क़ी नज़रों में तो
धन का एक यन्त्र भी है
भूल रहे हैं वे
सबके ऊपर वह मनुष्य है
उसे चहिए प्यार
चहिए खुली हवा
लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह
चाह रही है वह जीना
लेकिन घुट-घुट कर मरना भी
क्या जीना ?
घर-घर में शमशान-घाट है
घर-घर में फाँसी-घर है, घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों से टकराकर
गिरती है वह
गिरती है आधी दुनिया
सारी मनुष्यता गिरती है
हम जो ज़िंदा हैं
हम सब अपराधी हैं
हम दण्डित हैं ।
आएँगे, अच्छे दिन आएँगें,
गर्दिश के दिन ये कट जाएँगे ।
सूरज झोपड़ियों में चमकेगा,
बच्चे सब दूध में नहाएँगे ।
सपनों की सतरंगी डोरी पर
मुक्ति के फ़रहरे लहराएँगे ।

