Gorakh Pandey Poetry: मशहूर क्रांतिकारी कवि गोरख पाण्डेय की लिखी कुछ सबसे मशहूर कवितायेँ
गोरख पाण्डेय का जन्म साल 1945 में यूपी के देवरिया ज़िले के पंडित मुड़ेरवा गांव में हुआ था. फिर पढ़ाई के सिलसिले में बनारस पहुंच गए. वही बनारस, जो आज भी तमाम तरह की घटनाक्रमों के लिए चर्चित रहता है. भोलेनाथ का बनारस. मंदिरों का बनारस. मणिकर्णिका वाला बनारस. सारनाथ वाला बनारस. कबीर-तुलसी-रैदास वाला बनारस. लिस्ट लंबी है तो पन्ने पलटते हुए प्रधानमंत्री की संसदीय सीट वाले बनारस पर आ जाते हैं. वही बनारस, जहां के काशी हिंदू विश्वविद्यालय की आजकल लगातार ख़बरें आ रही हैं. कभी छात्रों के प्रदर्शन पर, तो कभी एक मुस्लिम प्रोफे़सर की नियुक्ति पर रोड़ा अटकाने को लेकर.
'मैं बनारस तत्काल छोड़ देना चाहता हूं. तत्काल! मैं यहां बुरी तरह ऊब गया हूं. विभाग, लंका, छात्रावास लड़कियों पर बेहूदा बातें. राजनीतिक मसखरी. हमारा हाल बिगड़े छोकरों सा हो गया है. लेकिन, क्या फिर हमें ख़ासकर मुझे जीवन के प्रति पूरी लगन से सक्रिय नहीं होना चाहिए? ज़रूर कभी भी शुरू किया जा सकता है. दिल्ली में अगर मित्रों ने सहारा दिया, तो हमें चल देना चाहिए. मैं यहां से हटना चाहता हूं. बनारस से कहीं और भाग जाना चाहता हूं.' बनारस से वह जेएनयू पहुंचते हैं. वही यूनिवर्सिटी, जिसके एक कमरे में उन्होंने अपनी ज़िंदगी समाप्त कर दी, तो आईये आज आपको मिलाएं इनकी कुछ सबसे मशहूर कविताओं से...
कैथर कला की औरतें
तीज-व्रत रखतीं, धान-पिसान करती थीं
ग़रीब की बीवी
गाँव भर की भाभी होती थीं
कैथरकला की औरतें
गाली-मार ख़ून पीकर सहती थीं
काला अच्छर
भैंस बराबर समझती थीं
लाल पगड़ी देखकर घर में
छिप जाती थीं
चूड़ियाँ पहनती थीं
ओठ सीकर रहती थीं
कैथरकला की औरतें
ज़ुल्म बढ़ रहा था
ग़रीब-गुरबा एकजुट हो रहे थे
बग़ावत की लहर आ गई थी
इसी बीच एक दिन
नक्सलियों की धर-पकड़ करने आई
पुलिस से भिड़ गईं
कैथरकला की औरतें
अरे, क्या हुआ? क्या हुआ ?
इतनी सीधी थीं गऊ जैसी
इस क़दर अबला थीं
कैसे बन्दूक़ें छीन लीं
पुलिस को भगा दिया कैसे ?
क्या से क्या हो गई
कैथरकला की औरतें ?
यह तो बग़ावत है
राम-राम, घोर कलिजुग आ गया
औरत और लड़ाई ?
उसी देश में जहाँ भरी सभा में
द्रौपदी का चीर खींच लिया गया
सारे महारथी चुप रहे
उसी देश में
मर्द की शान के ख़िलाफ़ यह ज़ुर्रत ?
ख़ैर, यह जो अभी-अभी
कैथरकला में छोटा-सा महाभारत
लड़ा गया और जिसमें
ग़रीब मर्दों के कन्धे से कन्धा
मिलाकर
लड़ी थीं कैथरकला की औरतें
इसे याद रखें
वे जो इतिहास को बदलना चाहते हैं
और वे भी
जो इसे पीछे मोड़ना चाहते हैं
इसे याद रखें
क्योंकि आने वाले समय में
जब किसी पर ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं
की जा सकेगी
और जब सब लोग आज़ाद होंगे
और ख़ुशहाल
तब सम्मानित
किया जाएगा जिन्हें
स्वतंत्रता की ओर से
उनकी पहली क़तार में
होंगी
कैथर कला की औरतें
हे भले आदमियो !
डबाडबा गई है तारों-भरी
शरद से पहले की यह
अँधेरी नम
रात ।
उतर रही है नींदसपनों के पंख फैलाए
छोटे-मोटे ह्ज़ार दुखों से
जर्जर पंख फैलाए
उतर रही है नींदहत्यारों के भी सिरहाने ।
हे भले आदमियो !
कब जागोगे
और हथियारों कोबेमतलब बना दोगे ?
हे भले आदमियो !
सपने भी सुखी और
आज़ाद होना चाहते हैं ।
समाजवाद
समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई
हाथी से आई, घोड़ा से आई
अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...
नोटवा से आई, बोटवा से आई
बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...
गाँधी से आई, आँधी से आई
टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...
काँगरेस से आई, जनता से आई
झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...
डालर से आई, रूबल से आई
देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...
वादा से आई, लबादा से आई
जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...
लाठी से आई, गोली से आई
लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...
महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई
केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...
छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन
बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...
परसों ले आई, बरसों ले आई
हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...
धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई
अँखियन पर परदा लगाई
समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई
तुम्हें डर है
हज़ार साल पुराना है उनका गुस्सा
हज़ार साल पुरानी है उनकी नफ़रत
मैं तो सिर्फ़
उनके बिखरे हुए शब्दों को
लय और तुक के साथ लौटा रहा हूँ
मगर तुम्हें डर है कि
आग भड़का रहा हूँ
उनका डर
वे डरते हैं
किस चीज़ से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और ग़रीब लोग
उनसे डरना
बंद कर देंगे ।
युग की नब्ज़ धरो
अफ़रीका, लातिन अमेरिका
उत्पीड़ित हर अंग एशिया
आदमखोरों की निगाह में
खंजर-सी उतरो!
जन-मन के विशाल सागर में
फैल प्रबल झंझा के स्वर में
चरण-चरण विप्लव की गति दो
लय-लय प्रलय करो!
श्रम की भट्ठी में गल-गलकर
जग के मुक्ति-चित्र में ढलकर
बन स्वच्छंद सर्वहारा के
ध्वज के संग लहरो!
शोषण छल-छंदों के गढ़ पर
टूट पडो नफ़रत सुलगाकर
क्रुद्ध अमन के राग, युद्ध के
पन्नों से गुज़रो!
उलटे अर्थ विधान तोड़ दो
शब्दों से बारूद जोड़ दो
अक्षर-अक्षर पंक्ति-पंक्ति को
छापामार करो!
एक झीना-सा परदा था
एक झीना-सा परदा था, परदा उठा
सामने थी दरख़्तों की लहराती हरियालियाँ
झील में चाँद कश्ती चलाता हुआ
और ख़ुशबू की बाँहों में लिपटे हुए फूल ही फूल थे
फिर तो सलमों-सितारों की साड़ी पहन
गोरी परियाँ कहीं से उतरने लगीं
उनकी पाजेब झन-झन झनकने लगी
हम बहकने लगे
अपनी नज़रें नज़ारों में खोने लगीं
चाँदनी उँगलियों के पोरों पे खुलने लगी
उनके होठ, अपने होठों में घुलने लगे
और पाजेब झन-झन झनकती रही
हम पीते रहे और बहकते रहे
जब तलक हल तरफ़ बेख़ुदी छा गई
हम न थे, तुम न थे
एक नग़मा था पहलू में बजता हुआ
एक दरिया था सहरा में उमड़ा हुआ
बेख़ुदी थी कि अपने में डूबी हुई
एक परदा था झीना-सा, परदा गिरा
और आँखें खुलीं...
ख़ुद के सूखे हलक में कसक-सी उठी
प्यास ज़ोरों से महसूस होने लगी ।

