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Asrar ul Haq Majaz Lakhnawi Shayari: उर्दू शायर मजाज़ लखनवी के वो मशहूर शेर जो दिखाते हैं औरतों का दर्द 

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19 अक्टूबर को बाराबंकी में रुदौली के ज़मींदार सिराज उल हक़ के दो बेटों की मौत के बाद तीसरे नम्बर पर रहे असरार उल हक़ अम्मी-अब्बू के जग्गन (जगन), सफ़िया- हमीदा-अन्सार के जग्गन भईया हैं. अब्बू चाहते थे असरार इंजीनियरिंग कर के उन्हीं की तरह सरकारी मुलाज़िम लग जाएं. लखनऊ, 'अमीनाबाद कॉलेज' से हाई स्कूल करके आगरा के सेंट जॉन में इंटर के लिये भेजे गये. पढ़ते हुए शायरी कहने लगे. इस्लाह के लिये फ़ानी बंदायूनी के पास बैठा करते. उस वक़्त तखल्लुस(उपनाम) 'शहीद' हुआ करता था. 'शहीद' को 'मजाज़' से तब्दील कर लेने का मशवरा देने वाले फ़ानी ने कुछ रोज़ बाद यह कह कर इस्लाह बंद कर दी कि भई, आपका और मेरा अंदाज़ जुदा है, तो आईये आपको पढ़ाएं इनके कुछ सबसे मशहूर शेर...

हुस्न को शर्मसार करना ही 
इश्क़ का इंतिक़ाम होता है 

ख़ूब पहचान लो असरार हूँ मैं 
जिंस-ए-उल्फ़त का तलबगार हूँ मैं 

कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी 
कुछ मुझे भी ख़राब होना था 

आँख से आँख जब नहीं मिलती 
दिल से दिल हम-कलाम होता है 

डुबो दी थी जहाँ तूफ़ाँ ने कश्ती 
वहाँ सब थे ख़ुदा क्या ना-ख़ुदा क्या 

हिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गया 
इंसाँ की जुस्तुजू में इक इंसाँ चला गया 

मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद 
उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई 

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया 
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं 

क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए 
उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम 

दफ़्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज़ को 
और तुम चाहो तो अफ़्साना बना सकता हूँ मैं 

वक़्त की सई-ए-मुसलसल कारगर होती गई 
ज़िंदगी लहज़ा-ब-लहज़ा मुख़्तसर होती गई 

कब किया था इस दिल पर हुस्न ने करम इतना 
मेहरबाँ और इस दर्जा कब था आसमाँ अपना 

तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन 
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था 

ये आना कोई आना है कि बस रस्मन चले आए 
ये मिलना ख़ाक मिलना है कि दिल से दिल नहीं मिलता 

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