Adam Gondvi Shayari: मशहूर शायर अदम गोंडवी की लिखी कुछ सबसे मशहूर कवितायेँ
रामनाथ सिंह, जिन्हें पूरी दुनिया अदम गोंडवी के नाम से जानती है, का जन्म 22 अक्तूबर 1947 को उत्तर प्रदेश के गोंडा जनपद के आटा ग्राम में हुआ था. अदम गोंडवी एक ऐसा शायर था धरती की सतह पर खड़े होकर दावे के साथ सत्ता को खुलेआम चुनौती देता था. जब सत्ता खुशहाली और तरक्की के दावे करते हुए जश्न मनाती है तो वहां उसी सत्ता को चुनौती देने वाला शायर अमद गोंडवी ही सवाल कर सकता है- सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है? अदम गोंडवी हर मेहनतकश, मजदूर, किसान और शोषित आदमी के दर्द की आवाज बने, तो आईये पढ़ें इनकी कुछ मशहूर कवितायेँ.....

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी हैउधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी हैलगी है होड़ – सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी हैतुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई हैइधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई हैकोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई हैरोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास मेंपक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास मेंआजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश मेंपैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास मेंजनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करेंलोकरंजन हो जहां शम्बूक-वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करेंकितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्या करेंबुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्स का एहसास लेकर क्या करेंगर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने सेकि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर मेंकोठी के ज़ीने सेअदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने सेबहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने सेअदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे
तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे
एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे

