Osho on Ego : ओशो के अनुसार जानिए क्या है अहंकार ? वीडियो में जाने क्यों ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना है दुःख का मूल कारण
आध्यात्मिक चिंतन और जीवन दर्शन की बात आती है तो ओशो का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उनकी शिक्षाएं न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में लोगों के जीवन को गहराई से प्रभावित करती हैं। ओशो का मानना था कि इंसान का सबसे बड़ा बंधन उसका “अहंकार” है। यही अहंकार व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर कर देता है और उसे दुख, संघर्ष और पीड़ा की ओर धकेलता है। लेकिन आखिर ओशो के हिसाब से अहंकार की परिभाषा क्या थी? आइए विस्तार से जानते हैं।
अहंकार को ओशो ने क्यों कहा भ्रम?
ओशो के अनुसार अहंकार वास्तव में कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। यह सिर्फ एक मनगढ़ंत धारणा है जो मनुष्य अपने बारे में बना लेता है। जैसे ही बच्चा बड़ा होता है, समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था उसे यह सिखाती है कि “तुम कौन हो”। यह पहचान—नाम, जाति, धर्म, पद, उपलब्धियां—धीरे-धीरे उसके भीतर एक कृत्रिम व्यक्तित्व बना देती है। यही बनावटी पहचान “अहंकार” है। ओशो कहते थे कि यह एक तरह का भ्रम (illusion) है, क्योंकि इसके पीछे व्यक्ति का असली “स्व” छिपा रहता है।
‘मैं’ और ‘मेरा’ का खेल
ओशो ने अहंकार को “मैं और मेरा” की धारणा से जोड़ा। जब इंसान यह कहना शुरू करता है—“यह मेरा घर है, यह मेरी उपलब्धि है, यह मेरी पहचान है”—तो वह अपने भीतर अहंकार को पोषित करता है। ओशो मानते थे कि असली अस्तित्व न तो “मैं” है और न ही “मेरा”, बल्कि सिर्फ “होना” है। जैसे ही व्यक्ति इस ‘होने’ की अवस्था को समझता है, अहंकार अपने आप मिट जाता है।
अहंकार और पीड़ा का रिश्ता
ओशो ने कहा कि हर संघर्ष और पीड़ा की जड़ अहंकार है। जब किसी का अहंकार चोटिल होता है तो वह क्रोधित हो जाता है, जब किसी का अहंकार संतुष्ट होता है तो वह आनंदित महसूस करता है। यानी इंसान का सुख-दुख बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि उसके अहंकार की स्थिति पर आधारित होता है। ओशो के अनुसार अगर इंसान अपने भीतर से अहंकार को समाप्त कर दे, तो वह स्वतः ही शांति और आनंद का अनुभव करेगा।
अहंकार बनाम आत्मा
ओशो की दृष्टि में आत्मा और अहंकार दो बिल्कुल विपरीत अवस्थाएं हैं। आत्मा शुद्ध चेतना है, जो हमेशा शांत, स्थिर और आनंदमय रहती है। जबकि अहंकार हमेशा तुलना, स्पर्धा और मान्यता की तलाश करता है। यही कारण है कि अहंकार के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। ओशो कहते थे कि आत्मा को जानना है तो अहंकार को त्यागना होगा, क्योंकि दोनों एक साथ नहीं रह सकते।
समाज में अहंकार की भूमिका
ओशो ने यह भी स्पष्ट किया कि समाज अहंकार को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाता है। बचपन से ही बच्चों को यह सिखाया जाता है कि उन्हें दूसरों से आगे निकलना है, अपनी पहचान बनानी है और सफलता के शिखर तक पहुँचना है। धीरे-धीरे यह प्रतिस्पर्धा व्यक्ति को अहंकारी बना देती है। ओशो का मानना था कि समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि असली शिक्षा व्यक्ति को “स्व” तक पहुँचाने वाली होनी चाहिए, न कि उसके अहंकार को और मजबूत करने वाली।
ध्यान से मिलता है अहंकार से मुक्ति
ओशो ने अहंकार से मुक्ति का मार्ग ध्यान बताया। उनका कहना था कि जब इंसान ध्यान में जाता है, तो वह अपने भीतर के सच्चे स्वरूप से जुड़ता है। ध्यान की अवस्था में ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है और व्यक्ति अपनी वास्तविक आत्मा को पहचानने लगता है। यही पहचान उसे अहंकार से मुक्त कर देती है और वह जीवन में पहली बार शांति और आनंद का अनुभव करता है।
ओशो का संदेश
ओशो का संदेश था कि अहंकार को तोड़ो और स्वयं को जानो। उनके अनुसार “अहंकार एक दीवार है और आत्मा खुला आकाश है।” जब तक इंसान अहंकार की दीवार को तोड़ नहीं देता, तब तक वह अपने भीतर छिपे अनंत आकाश का अनुभव नहीं कर सकता। ओशो यह भी कहते थे कि जीवन का असली उद्देश्य अपने अस्तित्व की सच्चाई को पहचानना है, और यह तभी संभव है जब हम अहंकार को त्यागकर ध्यान और जागरूकता की राह पर चलें।

