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जन्म की उम्र नहीं, अब पता चलेगी दिमाग की असली उम्र! खून की एक जांच से खुलेगा बड़ा राज
 

जन्म की उम्र नहीं, अब पता चलेगी दिमाग की असली उम्र! खून की एक जांच से खुलेगा बड़ा राज


हमारी उम्र सिर्फ जन्म की तारीख से तय नहीं होती। शरीर के अलग-अलग अंग अपनी अलग गति से उम्रदराज होते हैं। किसी व्यक्ति की उम्र 50 साल हो सकती है, लेकिन उसका दिमाग या दिल जैविक रूप से उससे ज्यादा या कम उम्र का हो सकता है। इसी बायोलॉजिकल एज को समझने की दिशा में Stanford Medicine के वैज्ञानिकों ने एक अहम तरीका विकसित किया है।

खून के जरिए पता चलेगी 11 अंगों की उम्र

Stanford University के न्यूरोलॉजिस्ट Tony Wyss-Coray और उनकी टीम ने ब्लड प्रोटीन के आधार पर शरीर के 11 प्रमुख अंगों और अंग-प्रणालियों की जैविक उम्र का अनुमान लगाने वाला मॉडल तैयार किया है।

इसमें दिमाग, हृदय, फेफड़े, किडनी, लिवर, मांसपेशियां, धमनियां, अग्न्याशय, आंत, वसा ऊतक और इम्यून सिस्टम शामिल हैं। अध्ययन में UK Biobank के 44,498 लोगों के डेटा और करीब 2,916 प्रोटीनों का विश्लेषण किया गया। 

कैसे काम करता है यह टेस्ट?

खून में मौजूद कई प्रोटीन शरीर के अलग-अलग अंगों से जुड़े होते हैं। वैज्ञानिक इन प्रोटीनों के स्तर को मशीन-लर्निंग मॉडल की मदद से देखते हैं और उनकी तुलना समान उम्र के लोगों के औसत प्रोटीन पैटर्न से करते हैं।

इसके आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि किसी अंग की जैविक उम्र व्यक्ति की वास्तविक उम्र के मुकाबले ज्यादा है या कम। यानी यह सीधे तौर पर यह नहीं कहता कि अंग की उम्र बिल्कुल कितने साल है, बल्कि उसकी जैविक स्थिति को उम्र के संदर्भ में मापता है। 


बूढ़े दिमाग से बढ़ सकता है अल्जाइमर का खतरा

रिसर्च में सबसे दिलचस्प नतीजे दिमाग को लेकर सामने आए। जिन लोगों का दिमाग बेहद ज्यादा उम्रदराज पाया गया, उनमें भविष्य में अल्जाइमर विकसित होने का खतरा काफी अधिक था। अध्ययन में इस समूह के लिए अल्जाइमर का जोखिम लगभग 3.1 गुना पाया गया।

इसके उलट, अपेक्षाकृत युवा जैविक उम्र वाले दिमाग को अल्जाइमर के कम जोखिम से जोड़ा गया। 

सिर्फ दिमाग ही नहीं, कई अंगों की उम्र मायने रखती है

रिसर्च में यह भी पाया गया कि शरीर में जितने ज्यादा अंग जैविक रूप से उम्रदराज होते हैं, मृत्यु का जोखिम उतना अधिक बढ़ता है। अध्ययन में 2-4 ज्यादा उम्र वाले अंगों के साथ मृत्यु जोखिम का अनुपात 2.3, 5-7 अंगों के साथ 4.5 और 8 या उससे ज्यादा अंगों के साथ 8.3 तक पाया गया।

वहीं युवा दिमाग और युवा इम्यून सिस्टम को बेहतर लंबी उम्र से जोड़ा गया। 

भविष्य में डॉक्टरों के लिए बन सकता है उपयोगी टूल

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की तकनीक भविष्य में बीमारी के लक्षण सामने आने से पहले जोखिम पहचानने में मदद कर सकती है। अगर किसी व्यक्ति के किसी खास अंग की जैविक उम्र उसकी वास्तविक उम्र से काफी ज्यादा दिखाई देती है, तो डॉक्टर उस व्यक्ति की निगरानी, जांच और जीवनशैली में बदलाव पर पहले से ध्यान दे सकते हैं।

हालांकि, यह अभी सामान्य अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाला नियमित डायग्नोस्टिक टेस्ट नहीं है। फिलहाल यह शोध-आधारित तकनीक है और इसके क्लिनिकल इस्तेमाल से पहले और अधिक वैलिडेशन की जरूरत होगी। 

उम्र का नया पैमाना बन सकती है ‘बायोलॉजिकल एज’

इस शोध से यह समझ मजबूत होती है कि जन्म से तय उम्र और शरीर की वास्तविक जैविक स्थिति एक जैसी होना जरूरी नहीं है। भविष्य में ब्लड प्रोटीन और AI आधारित ऐसे मॉडल डॉक्टरों को यह समझने में मदद कर सकते हैं कि शरीर का कौन-सा अंग तेजी से बूढ़ा हो रहा है और किस बीमारी का खतरा पहले से बढ़ रहा है।

यानी आने वाले समय में सिर्फ “आपकी उम्र कितनी है?” पूछना ही काफी नहीं होगा, बल्कि यह सवाल भी अहम हो सकता है कि “आपके शरीर के अंगों की उम्र कितनी है?”


सुबह की शुरुआत प्राणायाम से, तनाव होगा कम और फोकस बढ़ाने में मिलेगी मदद

सुबह का समय शरीर और दिमाग को शांत रखने के लिए अच्छा माना जाता है। ऐसे में दिन की शुरुआत कुछ मिनट प्राणायाम से करने से मन को सुकून मिलने के साथ शरीर को एक्टिव रखने में भी मदद मिल सकती है। प्राणायाम सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाली योगिक तकनीक है। हालांकि, इसका अभ्यास सही तरीके और अपनी क्षमता के अनुसार करना जरूरी है।

तनाव कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद

प्राणायाम के दौरान सांसों पर ध्यान केंद्रित करने से मन को शांत करने में मदद मिल सकती है। नियमित अभ्यास कुछ लोगों में तनाव और बेचैनी कम करने में सहायक हो सकता है। साथ ही, सांसों पर ध्यान लगाने से एकाग्रता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

जो लोग पढ़ाई या ऑफिस के काम के लिए लंबे समय तक फोकस करना चाहते हैं, वे इसे अपने सुबह के रूटीन में शामिल कर सकते हैं। कुछ देर शांत बैठकर नियंत्रित तरीके से सांस लेने का अभ्यास दिन की शुरुआत को ज्यादा व्यवस्थित बना सकता है।

सांसों और शरीर को एक्टिव रखने में सहायक

प्राणायाम में सांस लेने और छोड़ने के तरीके पर विशेष ध्यान दिया जाता है। नियमित अभ्यास से सांसों के प्रति जागरूकता बढ़ सकती है और श्वसन क्षमता को बेहतर बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

सुबह प्राणायाम करने से कई लोगों को ताजगी महसूस हो सकती है और सुस्ती कम करने में मदद मिल सकती है। इसे हल्के योग या एक्सरसाइज के साथ भी दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है।

हालांकि, शुरुआत में बहुत तेज सांस लेने या लंबे समय तक सांस रोकने जैसे कठिन अभ्यास नहीं करने चाहिए। अभ्यास धीरे-धीरे और अपनी क्षमता के अनुसार करना बेहतर है।

नींद और रोजाना की दिनचर्या में भी हो सकता है फायदा

सांस और रिलैक्सेशन से जुड़े योग अभ्यास शरीर और दिमाग को शांत करने में मदद कर सकते हैं। नियमित रूप से ऐसा रूटीन अपनाने से कुछ लोगों को रात में बेहतर नींद लेने में भी सहायता मिल सकती है।

सुबह प्राणायाम के साथ हल्की एक्सरसाइज, पर्याप्त पानी और संतुलित नाश्ता शामिल किया जाए तो दिन की शुरुआत ज्यादा व्यवस्थित तरीके से की जा सकती है।

प्राणायाम करते समय इन बातों का रखें ध्यान

प्राणायाम हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता। अभ्यास करते समय अपनी क्षमता का ध्यान रखना जरूरी है। अगर सांस लेने में परेशानी, चक्कर या असहजता महसूस हो तो अभ्यास रोक देना चाहिए। सांस से जुड़ी किसी समस्या वाले व्यक्ति के लिए प्राणायाम शुरू करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।

ध्यान रखें: प्राणायाम स्वस्थ दिनचर्या का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे किसी बीमारी के इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
 

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