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Indian Food Debate: भारत की थाली में सिर्फ वेज या नॉनवेज नहीं, हजारों साल की विविधता; जानें खाने का पूरा इतिहास
 

Indian Food Debate: भारत की थाली में सिर्फ वेज या नॉनवेज नहीं, हजारों साल की विविधता; जानें खाने का पूरा इतिहास

नई दिल्ली में हुए BRICS Summit 2026 के गाला डिनर में मेहमानों को पूरी तरह शाकाहारी भारतीय व्यंजन परोसे गए। मेन्यू में खांडवी, पनीर लबाबदार, मिलेट पुलाव, खुंब गलौटी और जलेबी जैसे पकवान शामिल थे। इसके बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने भारत में शाकाहार और मांसाहार को लेकर नई बहस छेड़ दी।

राहुल गांधी ने भारतीयों की खान-पान की आदतों का जिक्र करते हुए नॉनवेज खाने की पसंद का आंकड़ा साझा किया। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विदेशी मेहमानों ने भारतीय शाकाहारी व्यंजनों का आनंद लिया। इसके बाद यह चर्चा सिर्फ BRICS डिनर तक सीमित नहीं रही, बल्कि सवाल उठने लगा कि आखिर भारत का 'असली खाना' क्या है?

क्या भारत हमेशा से शाकाहारी देश रहा है?
इतिहास पर नजर डालें तो भारत में शाकाहार और मांसाहार दोनों की परंपराएं लंबे समय से मौजूद रही हैं। सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी खुदाइयों में मवेशियों, भेड़, मछली और अन्य जीवों की हड्डियां मिलने के आधार पर इतिहासकारों ने उस दौर में मांसाहार के प्रचलन की संभावना जताई है।
वैदिक काल को लेकर भी इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत रहे हैं। आर.एस. शर्मा समेत कुछ इतिहासकारों ने अपनी किताबों में उस समय पशु आहार और मांस के इस्तेमाल का उल्लेख किया है।
इससे यह तस्वीर सामने आती है कि भारतीय खान-पान की परंपरा को सिर्फ शाकाहार तक सीमित करना इतिहास की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
बौद्ध और जैन परंपराओं ने शाकाहार को दिया बढ़ावा
भारत में शाकाहार को व्यापक धार्मिक और सामाजिक आधार मिलने में बौद्ध तथा जैन परंपराओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। करीब छठी शताब्दी ईसा पूर्व में महावीर और बुद्ध की शिक्षाओं में अहिंसा को विशेष महत्व दिया गया।
हालांकि, गौतम बुद्ध के व्यक्तिगत खान-पान को लेकर इतिहास में अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। इसलिए उनके भोजन को लेकर किए जाने वाले सभी दावों को एक ही तरह से तथ्य नहीं माना जा सकता।
बाद के दौर में अहिंसा और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी विचारधाराओं ने भारतीय समाज के कई हिस्सों में शाकाहारी भोजन को मजबूत सामाजिक पहचान दी।

मुगलों से पहले भी भारत में था नॉनवेज
भारतीय नॉनवेज व्यंजनों की कहानी को सिर्फ मुगल काल से जोड़ना भी पूरी तस्वीर नहीं है। भारत में मांस, मछली और दूसरे पशु उत्पादों के इस्तेमाल की परंपराएं इससे कहीं पुरानी हैं।
मुगल काल में हालांकि फारसी और मध्य एशियाई पाक कला का भारतीय मसालों और स्थानीय सामग्री से मेल हुआ। इसके परिणामस्वरूप बिरयानी, कबाब, कोरमा और निहारी जैसे मुगलई व्यंजनों को लोकप्रियता मिली।
इसी तरह भारत के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय परिस्थितियों और समुदायों के हिसाब से नॉनवेज खाने की अपनी परंपराएं विकसित होती रहीं।
क्या भारत में 80 फीसदी लोग नॉनवेज खाते हैं?
राहुल गांधी के करीब 80 फीसदी वाले दावे की चर्चा के बीच NFHS-5 (2019-21) के आंकड़ों को देखना दिलचस्प है। 15 से 49 वर्ष की उम्र के करीब 87 फीसदी पुरुष और 75 फीसदी महिलाएं मांस, मछली या अंडा खाने की जानकारी देती हैं। दोनों आंकड़ों को मिलाकर यह अनुपात करीब 80 फीसदी बैठता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देश की 80 फीसदी आबादी रोजाना मांस खाती है। यह आंकड़ा उन लोगों से जुड़ा है जिन्होंने मांस, मछली या अंडे के सेवन की जानकारी दी है।

राज्यों के बीच भी बड़ा अंतर दिखाई देता है। कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में मांसाहार का अनुपात बेहद ज्यादा है, जबकि राजस्थान जैसे राज्यों में शाकाहारी आबादी का अनुपात काफी ऊंचा है।
धर्म के साथ खाने की आदत का रिश्ता कितना सीधा है?
खाने की पसंद पर धर्म, क्षेत्र, समुदाय, परिवार और स्थानीय संस्कृति का प्रभाव जरूर पड़ता है, लेकिन इसे केवल धार्मिक पहचान से समझना आसान नहीं है।
भारत में ऐसे हिंदू समुदाय हैं जहां मांसाहार सामान्य है, जबकि कई हिंदू समुदाय सख्त शाकाहारी हैं। इसी तरह अलग-अलग धर्मों के भीतर भी खान-पान की आदतों में काफी विविधता देखने को मिलती है।
यही वजह है कि भारत की फूड कल्चर को एक ही धार्मिक या सामाजिक पैमाने से देखना मुश्किल है।
शाकाहार को सामाजिक प्रतिष्ठा से कैसे जोड़ा गया?
समय के साथ भारत के कुछ सामाजिक वर्गों में शाकाहार को पवित्रता, धार्मिकता और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा गया। दूसरी तरफ मांसाहार को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में अलग सामाजिक धारणाएं विकसित हुईं।
यही कारण है कि आज भी कई जगहों पर खाने की पसंद को लेकर सामाजिक बहस देखने को मिलती है। हॉस्टल, किराए के मकान, रिहायशी सोसाइटी और संस्थानों में वेज और नॉनवेज को लेकर अलग-अलग नियम बनाए जाने के मामले सामने आते रहे हैं।
इससे यह सवाल भी उठता है कि किसी व्यक्ति की भोजन संबंधी निजी पसंद को सामाजिक पहचान का आधार कितना बनाया जाना चाहिए।
भारत की असली थाली कैसी है?
फूड हिस्टोरियन पुष्पेश पंत के विचारों के मुताबिक भारतीय भोजन को किसी एक डिश या एक फूड स्टाइल में समेटना संभव नहीं है। भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता उसकी थाली में भी दिखाई देती है।
राजस्थान में दाल-बाटी-चूरमा और कई शाकाहारी व्यंजन लोकप्रिय हैं, जबकि बंगाल की भोजन परंपरा में मछली और मिठाइयों की खास जगह है। दक्षिण भारत के कई हिस्सों में चावल, नारियल और समुद्री भोजन महत्वपूर्ण हैं। वहीं कश्मीर का वाज़वान मांसाहारी व्यंजनों की समृद्ध परंपरा का उदाहरण है।

गोवा की रसोई में पुर्तगाली प्रभाव दिखाई देता है, जबकि तमिलनाडु की चेट्टीनाड शैली अपने मसालेदार नॉनवेज व्यंजनों के लिए जानी जाती है।
यानी भारत में वेज और नॉनवेज दोनों ही उसकी खाद्य संस्कृति का हिस्सा हैं।
जब खाने की पसंद बन जाती है राजनीतिक मुद्दा
BRICS डिनर को लेकर शुरू हुई बहस ने एक बार फिर यह दिखाया कि भारत में भोजन सिर्फ स्वाद या पोषण का विषय नहीं है। यह कई बार धर्म, पहचान, संस्कृति और राजनीति से भी जुड़ जाता है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में नॉनवेज पर प्रतिबंध, धार्मिक आयोजनों के दौरान मांस की बिक्री पर रोक या संस्थानों में भोजन को लेकर नियम समय-समय पर बहस का कारण बनते रहे हैं। दूसरी तरफ कई राजनीतिक नेता खुद खान-पान को निजी पसंद का विषय बताते रहे हैं।
भारत की पहचान उसकी विविध थाली में है
भारत की खाद्य संस्कृति को सिर्फ शाकाहारी या मांसाहारी के खांचे में रखना इसकी वास्तविक विविधता को छोटा कर देता है। यहां अलग-अलग राज्यों, समुदायों और परंपराओं ने सदियों में अपनी-अपनी भोजन शैली विकसित की है।
इसलिए भारत की 'असली थाली' किसी एक तरह की नहीं है। कहीं दाल-बाटी है, कहीं मछली-भात, कहीं कबाब और बिरयानी तो कहीं जैन भोजन की बेहद सख्त शाकाहारी परंपरा।
यही विविधता भारतीय खान-पान की सबसे बड़ी पहचान है और शायद इसी वजह से देश की थाली को किसी एक परिभाषा में बांधना इतना मुश्किल है।
 

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