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अहंकार का त्याग कैसे करें VIDEO ओशो के विचार बताते हैं खुद को दूसरों से बेहतर समझने की आदत कैसे छोड़ें

अहंकार का त्याग कैसे करें VIDEO ओशो के विचार बताते हैं खुद को दूसरों से बेहतर समझने की आदत कैसे छोड़ें

इंसान के जीवन में अहंकार कई बार बिना महसूस हुए प्रवेश कर जाता है। अपनी सफलता, ज्ञान, धन, पद या दूसरों से मिली प्रशंसा के कारण व्यक्ति खुद को दूसरों से बेहतर समझने लग सकता है। आध्यात्मिक गुरु ओशो ने अहंकार को लेकर अपने प्रवचनों में आत्म-जागरूकता और स्वयं को देखने की प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया। उनके विचारों की व्याख्या के अनुसार अहंकार को दबाने के बजाय उसे समझना जरूरी है।

अहंकार को पहचानना पहला कदम

अहंकार को छोड़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह किस रूप में हमारे व्यवहार में मौजूद है। जब व्यक्ति हर बातचीत में खुद को सही साबित करना चाहता है, आलोचना स्वीकार नहीं करता या लगातार दूसरों से अपनी तुलना करता है, तो यह अहंकार की अभिव्यक्ति हो सकती है।

ओशो की शिक्षाओं में स्वयं को देखने और अपने विचारों के प्रति जागरूक रहने की बात प्रमुखता से आती है। व्यक्ति जितना अपने व्यवहार को बिना पक्षपात के देखता है, उतना ही वह अपनी कमजोरियों को समझ सकता है।

हर बात में खुद को सही साबित न करें

अहंकार अक्सर व्यक्ति को यह विश्वास दिलाता है कि वही सही है। किसी बहस में जीतने की इच्छा भी इसी मानसिकता से जुड़ सकती है। हर स्थिति में अपनी बात साबित करने के बजाय कभी-कभी सामने वाले की बात सुनना और यह स्वीकार करना कि हम भी गलत हो सकते हैं, आत्म-जागरूकता की दिशा में कदम हो सकता है।

प्रशंसा और आलोचना दोनों को समझें

जब व्यक्ति अपनी पहचान को दूसरों की प्रशंसा से जोड़ लेता है तो तारीफ मिलने पर बहुत खुशी और आलोचना होने पर बहुत दुख हो सकता है। ओशो के विचारों को समझें तो बाहरी राय से अपनी पूरी पहचान तय करने के बजाय स्वयं को भीतर से समझने पर जोर मिलता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि आलोचना को हमेशा सही माना जाए। बल्कि आलोचना सुनकर यह देखना चाहिए कि उसमें सुधार के लिए कुछ उपयोगी बात है या नहीं।

तुलना से बचें

अहंकार को मजबूत करने वाली आदतों में दूसरों से लगातार तुलना करना भी शामिल हो सकता है। कभी व्यक्ति अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है तो कभी किसी दूसरे की सफलता देखकर खुद को कमतर समझने लगता है। दोनों स्थितियों में ध्यान दूसरे व्यक्ति पर केंद्रित रहता है।

अपनी तुलना कल के स्वयं से करना अधिक उपयोगी हो सकता है। इससे व्यक्ति का ध्यान दूसरों को पीछे छोड़ने के बजाय अपने विकास पर रहता है।

उपलब्धियों को अपनी पूरी पहचान न बनाएं

धन, पद, सफलता और प्रसिद्धि जीवन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इन्हें अपनी पूरी पहचान बना लेना व्यक्ति को अहंकार की ओर ले जा सकता है। सफलता मिलने के बाद भी विनम्र रहना और यह समझना कि परिस्थितियों, लोगों और अवसरों ने भी इसमें योगदान दिया है, दृष्टिकोण को संतुलित रख सकता है।

अहंकार का त्याग दबाव से नहीं, समझ से

ओशो के विचारों की एक महत्वपूर्ण व्याख्या यह है कि किसी चीज को केवल दबाने से वह समाप्त नहीं होती। इसलिए अहंकार को जबरदस्ती खत्म करने के बजाय उसके व्यवहार को देखना और समझना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

अंततः अहंकार छोड़ने का अर्थ खुद को छोटा समझना नहीं है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि व्यक्ति अपनी क्षमताओं को स्वीकार करते हुए भी दूसरों को कमतर न समझे। आत्मविश्वास और विनम्रता साथ-साथ रह सकते हैं। यही समझ व्यक्ति को अधिक सहज, संतुलित और जागरूक जीवन की ओर ले जा सकती है।

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