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भगवान श्री कृष्ण के हाथों मरकर कैसे बना भीम का पोता कलयुग का भगवान? जानें महाभारत से जुड़ा रोचक किस्सा

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महाभारत के युद्ध और श्रीकृष्ण से जुड़ी कथाएं भारतीय पुराणों में गहराई से समाई हुई हैं। इन कहानियों में केवल युद्ध, धर्म और अधर्म की बात नहीं होती, बल्कि उनमें भविष्य की भी झलक मिलती है। ऐसी ही एक कथा है भीम के पोते और श्रीकृष्ण के बीच की, जो यह बताती है कि किस प्रकार एक राक्षस श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया, लेकिन कलयुग में ‘भगवान’ के रूप में पूजित हुआ। यह कथा केवल रहस्य और चमत्कार से नहीं भरी है, बल्कि यह हमारी आस्था, परंपराओं और धर्म के गहरे संबंध को उजागर करती है। आइए जानते हैं कि कौन था यह राक्षस, उसका श्रीकृष्ण से क्या संबंध था, और कैसे वह कलयुग में बन गया एक पूज्य देवता।

कौन था यह रहस्यमय राक्षस?

यह कथा जुड़ी है भीम के पोते ‘बरबरिक’ से। बरबरिक महाभारत के एक ऐसे योद्धा थे, जो युद्ध में भाग नहीं ले सके, लेकिन उनकी शक्ति इतनी थी कि वे अकेले ही महाभारत का परिणाम बदल सकते थे। बरबरिक, घटोत्कच के पुत्र थे और भीम के पोते। बचपन से ही उन्होंने देवी भगवती की भक्ति की थी और तीन अमोघ बाणों का वरदान प्राप्त किया था। यह बाण इतने शक्तिशाली थे कि एक से दुश्मन को चिन्हित किया जा सकता था, दूसरे से नष्ट और तीसरे से वापस बुलाया जा सकता था।

श्रीकृष्ण ने क्यों लिया बरबरिक का सिर?

महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने एक रणनीतिक निर्णय लिया। उन्होंने यह जाना कि बरबरिक, जो युद्ध में निष्पक्ष रहना चाहता था, सबसे शक्तिशाली पक्ष के साथ जाएगा। चूंकि हर बार एक पक्ष हारने लगेगा, वह उसी की तरफ जाएगा, जिससे अकेले ही सारे योद्धा समाप्त हो जाएंगे और धर्म युद्ध का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। श्रीकृष्ण ने वेश बदलकर बरबरिक से युद्ध में भाग लेने की उसकी इच्छा के बारे में पूछा और फिर उससे गुरुदक्षिणा की मांग की। उन्होंने बरबरिक से उसका शीश (सिर) मांगा। धर्म का पालन करते हुए बरबरिक ने हँसते हुए अपना शीश श्रीकृष्ण को अर्पित कर दिया।

युद्ध का साक्षी बना बरबरिक का शीश

श्रीकृष्ण ने बरबरिक के सिर को युद्धभूमि के एक ऊँचे स्थान पर रखा और कहा कि वह अब इस युद्ध का साक्षी रहेगा। महाभारत युद्ध के अंत में जब पांडवों ने दावा किया कि उन्होंने यह युद्ध जीता है, तो श्रीकृष्ण ने बरबरिक के सिर से पूछा कि वास्तव में कौन इस युद्ध का नायक था? तब बरबरिक का सिर बोला: "मैंने देखा कि युद्धभूमि में हर जगह केवल श्रीकृष्ण की माया और सुदर्शन चक्र ही काम कर रहे थे। असली विजेता श्रीकृष्ण ही हैं।"

कलयुग में कैसे बने ‘खाटू श्याम’?

बरबरिक के बलिदान से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में तुम्हारी पूजा मेरे नाम ‘श्याम’ से की जाएगी। तुम उन सभी भक्तों के कष्ट दूर करोगे जो सच्चे मन से तुम्हें याद करेंगे। यही कारण है कि कलयुग में बरबरिक को "खाटू श्याम जी" के नाम से पूजा जाता है। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू धाम इस कथा का सबसे प्रमुख प्रमाण है, जहां लाखों श्रद्धालु हर वर्ष श्याम बाबा के दर्शन के लिए उमड़ते हैं। कहा जाता है कि यहां मौजूद श्याम बाबा की मूर्ति वहीं स्थित है जहां बरबरिक का सिर रखा गया था।

क्यों कहलाते हैं "हारे का सहारा"?

खाटू श्याम बाबा को "हारे का सहारा" कहा जाता है क्योंकि वे हर उस व्यक्ति की सहायता करते हैं जो हार की कगार पर खड़ा हो, निराश हो, या जिसने जीवन में सबकुछ खो दिया हो। यह नाम उनके उस स्वरूप को दर्शाता है जब उन्होंने युद्ध में भाग नहीं लिया, लेकिन निस्वार्थ भाव से अपना सिर अर्पित कर दिया

निष्कर्ष

महाभारत की इस कथा में शक्ति, त्याग, भक्ति और भगवान श्रीकृष्ण की दूरदृष्टि का समावेश है। एक ऐसा योद्धा जो युद्ध कर सकता था, लेकिन नहीं किया। एक ऐसा राक्षसी शक्ति वाला बालक, जो भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया, लेकिन उनके ही आशीर्वाद से कलयुग में भगवान बन गया। आज भी खाटू श्याम बाबा के मंदिरों में गूंजते भजन, चढ़ते फूल और आस्था से झुकते सर यह प्रमाण देते हैं कि श्रीकृष्ण के द्वारा दिया गया वचन सदियों बाद भी श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।यह कथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारे विश्वास की जीवंत धरोहर है – जो हमें सिखाती है कि सच्चा बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता, वह किसी न किसी रूप में पूजित हो जाता है।

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