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House Construction Tips: घर बनवाते समय कॉलम का सही साइज क्या होना चाहिए? जानें सिविल इंजीनियर का सही तरीका

House Construction Tips: घर बनवाते समय कॉलम का सही साइज क्या होना चाहिए? जानें सिविल इंजीनियर का सही तरीका

घर बनवाते समय लोग अक्सर नक्शे, कमरों के साइज और खूबसूरत डिजाइन पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन घर की मजबूती के लिए कॉलम, बीम और फुटिंग का सही डिजाइन सबसे महत्वपूर्ण होता है। कॉलम ही ऊपर की मंजिलों और स्लैब का भार नींव के जरिए जमीन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, हर घर के लिए कॉलम का एक ही साइज सही नहीं होता। इसका आकार भवन की मंजिलों की संख्या, कॉलम के बीच की दूरी, फ्लोर की ऊंचाई, मिट्टी की क्षमता और भवन पर आने वाले कुल भार जैसी कई चीजों के आधार पर तय किया जाता है।

इसलिए पड़ोसी के घर में लगे कॉलम का साइज देखकर अपने घर में भी वही कॉलम बनवा देना सही तरीका नहीं है।

कितनी मंजिल का घर है, यह सबसे पहले देखें

कॉलम का डिजाइन तय करते समय सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि मकान कितनी मंजिल का है। G+1, G+2 या इससे ज्यादा मंजिलों वाली इमारतों में कॉलम पर आने वाला भार अलग-अलग होता है।

जैसे-जैसे मंजिलों की संख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे कॉलम, बीम और नींव पर पड़ने वाला भार भी बढ़ सकता है। इसलिए पूरे भवन के स्ट्रक्चरल डिजाइन के आधार पर ही कॉलम का साइज तय किया जाना चाहिए।

कॉलम के बीच की दूरी भी बहुत मायने रखती है

कॉलम से कॉलम की दूरी बढ़ने पर बीम और कॉलम पर आने वाला भार बदल सकता है। उदाहरण के तौर पर, कुछ सामान्य G+2 आवासीय मामलों में करीब 8 से 10 फीट के स्पैन पर 9×9 इंच जैसे सेक्शन पर विचार किया जा सकता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर G+2 मकान में 9×9 इंच का कॉलम ही लगाया जाए। अगर कॉलम के बीच की दूरी ज्यादा है या भवन पर अतिरिक्त भार है, तो अलग और बड़े सेक्शन की जरूरत हो सकती है।

यानी कॉलम का साइज केवल मंजिलों की संख्या से नहीं, बल्कि पूरे स्ट्रक्चरल डिजाइन से तय होता है।

मिट्टी की जांच को नजरअंदाज न करें

मकान की मजबूती सिर्फ कॉलम पर निर्भर नहीं करती। कॉलम के नीचे बनने वाली फुटिंग और नींव का डिजाइन मिट्टी की क्षमता से भी जुड़ा होता है।

अगर जमीन की मिट्टी कमजोर है तो नींव के आकार और डिजाइन में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए निर्माण शुरू करने से पहले साइट की मिट्टी और उसकी भार वहन क्षमता की जांच कराना महत्वपूर्ण है।

फ्लोर की ऊंचाई भी बदल सकती है डिजाइन

घर में सामान्य से ज्यादा फ्लोर हाइट रखी जा रही है तो कॉलम की लंबाई बढ़ सकती है। इससे कॉलम के डिजाइन और उसकी स्थिरता से जुड़ी जरूरतें भी बदल सकती हैं।

इसलिए स्ट्रक्चरल डिजाइन तैयार करते समय फ्लोर की ऊंचाई, बीम की स्थिति, स्लैब और कॉलम की लंबाई जैसी चीजों को भी ध्यान में रखा जाता है।

9×9 या 9×15 इंच को फिक्स नियम न समझें

कई बार घर बनवाते समय लोग 9×9, 9×15 या 12×18 इंच जैसे कॉलम साइज को एक तय मानक समझ लेते हैं। ऐसा करना सही नहीं है।

कॉलम का सही आकार भवन के वास्तविक डिजाइन और उस पर आने वाले भार की गणना के बाद तय किया जाना चाहिए। एक घर में जो साइज उपयुक्त हो सकता है, जरूरी नहीं कि वही साइज दूसरे घर के लिए भी सुरक्षित हो।

कॉलम, बीम और फुटिंग का डिजाइन इंजीनियर से करवाएं

घर की संरचना तैयार करते समय कॉलम के साथ-साथ बीम, स्लैब और फुटिंग का डिजाइन भी सही तरीके से होना जरूरी है। भारतीय मानकों के तहत RCC संरचनाओं के डिजाइन में संबंधित BIS कोड और साइट की परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है।

खासकर भूकंप की संभावना वाले क्षेत्रों में भवन की संरचनात्मक जरूरतों पर अतिरिक्त ध्यान देना पड़ता है।

घर बनवाते समय इन बातों का रखें ध्यान

  • सिर्फ पड़ोसी के मकान को देखकर कॉलम का साइज तय न करें।
  • भवन की कुल मंजिलों और भविष्य में बनने वाली मंजिलों को ध्यान में रखें।
  • कॉलम के बीच की दूरी और बीम के स्पैन को डिजाइन में शामिल करें।
  • जमीन की मिट्टी और उसकी भार वहन क्षमता की जांच कराएं।
  • फ्लोर की ऊंचाई और भवन पर आने वाले कुल भार का आकलन कराएं।
  • कॉलम के साथ बीम, स्लैब और फुटिंग का भी स्ट्रक्चरल डिजाइन तैयार कराएं।
  • अंतिम डिजाइन योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर से ही स्वीकृत कराएं।

सबसे जरूरी बात: घर की सुरक्षा के लिए किसी एक कॉलम साइज को सभी मकानों पर लागू होने वाला नियम न मानें। सही साइज साइट की जांच और पूरे स्ट्रक्चरल डिजाइन के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए।

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