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राजस्थान: भीलवाड़ा के सरकारी अस्पताल में दो और प्रसूताओं की मौत

जयपुर, 31 जुलाई (आईएएनएस)। भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल (एमजीएच) में दो और प्रसूताओं की मौत के बाद राजस्थान की मातृ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली एक बार फिर जांच के दायरे में आ गई है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, दोनों महिलाओं की डिलीवरी सामान्य हुई थी और उन्हें 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की श्रेणी में नहीं रखा गया था, लेकिन डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उनकी मौत हो गई।

जयपुर, 31 जुलाई (आईएएनएस)। भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल (एमजीएच) में दो और प्रसूताओं की मौत के बाद राजस्थान की मातृ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली एक बार फिर जांच के दायरे में आ गई है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, दोनों महिलाओं की डिलीवरी सामान्य हुई थी और उन्हें 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की श्रेणी में नहीं रखा गया था, लेकिन डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उनकी मौत हो गई।

ताजा मौतों के बाद, जुलाई में जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में हुई माताओं की मौतों की संख्या सात हो गई है। इससे डिलीवरी के बाद की देखभाल और इमरजेंसी में की जाने वाली कार्रवाई को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।

बुधवार देर रात हुई ये मौतें राजस्थान में माताओं की सेहत से जुड़ी कई घटनाओं के बीच हुई हैं। पहली पीड़ित, कोटड़ी की रहने वाली सुगना मोहन बैरवा (22) को नॉर्मल डिलीवरी के बाद दिक्कतें होने पर शाहपुरा से एमजी अस्पताल रेफर किया गया था।

परिवार के अनुसार, बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उनका ब्लड प्रेशर गिर गया। उन्हें इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में शिफ्ट किया गया, जहां बाद में उनकी मौत हो गई। प्रिंसिपल मेडिकल ऑफिसर डॉ. अरुण गौड़ ने बताया कि सुगना को डिलीवरी के बाद बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हुई, जिससे उनका हीमोग्लोबिन लेवल तेजी से गिर गया और मौत हो गई।

भीलवाड़ा शहर के पटेल नगर की रहने वाली 18 साल की रानी भूरा बंजारा की भी एमजी हॉस्पिटल में नॉर्मल डिलीवरी हुई थी। डॉक्टरों ने बताया कि डिलीवरी के बाद उन्हें अचानक और बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होने लगी।

आमतौर पर ऐसी ब्लीडिंग को रोकने के लिए पहले दवा दी जाती है और जरूरत पड़ने पर गर्भाशय निकालने के लिए सर्जरी की जाती है, लेकिन उनकी हालत इतनी तेजी से बिगड़ी कि जान बचाने वाली यह प्रक्रिया करने का समय ही नहीं मिला।

चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर (सीएमएचओ) डॉ. संजीव शर्मा ने कहा कि एंटीनेटल केयर (डिलीवरी से पहले की देखभाल) के दौरान किसी भी महिला को 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की श्रेणी में नहीं रखा गया था। डिलीवरी के बाद दोनों में अचानक जटिलताएं पैदा हो गईं।

उन्होंने कहा कि इस बात की जांच शुरू कर दी गई है कि डिलीवरी के बाद मॉनिटरिंग और इमरजेंसी इलाज की सुविधाएं होने के बावजूद मौतें क्यों हुईं। जांच करने वाले अधिकारी मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री, सोनोग्राफी रिपोर्ट, इलाज के रिकॉर्ड और मौत के असल कारणों की जांच करेंगे।

हाल ही में भीलवाड़ा जिले में एक सप्ताह तक चले स्क्रीनिंग अभियान के दौरान स्वास्थ्य अधिकारियों ने 2,210 गर्भवती महिलाओं की जांच की। इनमें से 500 (लगभग 23 प्रतिशत) महिलाओं में 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' (उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था) की पहचान की गई। जोखिम के कारणों में गंभीर एनीमिया, हाइपरटेंशन, डायबिटीज, दिल और किडनी की बीमारियां, पहले सिजेरियन डिलीवरी, जुड़वां बच्चों की गर्भावस्था और अन्य मेडिकल जटिलताएं शामिल थीं।

हालांकि, अधिकारियों ने यह भी देखा कि हाल ही में हुई कई माताओं की मौतों के मामलों में ऐसी महिलाएं शामिल थीं जिन्हें 'हाई-रिस्क' की श्रेणी में नहीं रखा गया था।

ये ताजा घटनाएं राजस्थान में एक चिंताजनक ट्रेंड को और बढ़ाती हैं। मई में कोटा में बच्चे के जन्म के बाद पांच महिलाओं की मौत हो गई थी। जून में बीकानेर में सिजेरियन डिलीवरी के बाद छह महिलाओं को किडनी फेलियर की समस्या हुई, जिनमें से दो की बाद में इलाज के दौरान मौत हो गई।

जुलाई में भीलवाड़ा में माताओं की सात मौतों के अलावा, बांसवाड़ा में भी इलाज के दौरान दो और महिलाओं की मौत हो गई। बार-बार हो रही इन घटनाओं ने मातृ स्वास्थ्य देखभाल, खासकर राज्य भर के सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी के बाद होने वाली जटिलताओं के प्रबंधन और आपातकालीन प्रसूति देखभाल को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

--आईएएनएस

ओपी/डीकेपी

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