अनिद्रा का असर नौकरी पर भी, 50 की उम्र के बाद रखना चाहिए खास ख्याल: अध्ययन
नई दिल्ली, 19 अगस्त (आईएएनएस)। रात में नींद न आना या फिर 'साउंड स्लीप' से दूरी नौकरीपेशा लोगों के लिए आफत का सबब बन सकती है। रात में खराब या बेहद बाधित नींद का असर सिर्फ अगले दिन की थकान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे 50 वर्ष की उम्र के बाद कामकाजी जीवन भी करीब नौ महीने तक कम हो सकता है। फिनलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ तुर्कू के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।
अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों को नींद से जुड़ी गंभीर परेशानियां थीं, वे बिना नींद की समस्या वाले लोगों की तुलना में 50 से 68 वर्ष की उम्र के बीच करीब आठ महीने कम काम करने की उम्मीद रख सकते हैं। मध्यम स्तर की नींद संबंधी परेशानी वाले लोगों की कामकाजी अवधि करीब पांच महीने कम पाई गई। यह प्रभाव लिंग और नौकरी के प्रकार से अलग था।
शोधकर्ताओं ने फिनिश पब्लिक सेक्टर (एफपीएस) और हेल्थ एंड सोशल सपोर्ट (एचईएसएसयूपी) अध्ययनों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया। इसमें 50 वर्ष की उम्र के बाद प्रतिभागियों की नींद की आदतों का आकलन किया गया। नींद की परेशानियों में सोने में दिक्कत, रात में बार-बार जागना, सुबह बहुत जल्दी नींद खुलना और पर्याप्त नींद लेने के बावजूद तरोताजा महसूस न करना शामिल था।
अध्ययन में रात की नींद को तीन श्रेणियों में बांटा गया था-सात घंटे से कम, सात से साढ़े आठ घंटे और नौ घंटे या उससे अधिक। शोध के अनुसार, सात घंटे से कम और सात से साढ़े आठ घंटे तक सोने वालों की 50 वर्ष की उम्र के बाद कामकाजी जीवन प्रत्याशा करीब 13 साल दो महीने रही। वहीं, नौ घंटे या उससे अधिक सोने वालों में यह अवधि घटकर करीब 12 साल पांच महीने रह गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, सबसे लंबी कामकाजी जीवन प्रत्याशा बिना नींद की समस्या वाली पेशेवर महिलाओं में देखी गई, जो लगभग 14 साल थी। इसके विपरीत, गंभीर नींद संबंधी समस्याओं वाले नियमित काम करने वाले पुरुषों में यह अवधि करीब साढ़े 12 साल रही।
अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डॉ. साना मायलिन्ताउस्ता ने कहा कि यह बात चौंकाने वाली थी कि सात घंटे से कम सोने और सात से नौ घंटे की नींद लेने वालों की कामकाजी जीवन प्रत्याशा में बड़ा अंतर नहीं मिला। हालांकि, उन्होंने कहा कि लंबे समय तक सोना कम कामकाजी जीवन और खराब स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा पाया गया।
शोधकर्ताओं ने मिडिल एज में नींद की सेहत पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई है, खासकर कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले लोगों के बीच। उनके अनुसार, अनिद्रा के इलाज के लिए व्यावसायिक स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए थेरेपी और कार्यस्थल पर नींद संबंधी जागरूकता कार्यक्रम मददगार हो सकते हैं।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि अध्ययन में कुछ अन्य महत्वपूर्ण कारकों, जैसे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, पहले से मौजूद बीमारियों, स्वास्थ्य संबंधी आदतों और शिफ्ट में काम करने जैसी परिस्थितियों को पूरी तरह शामिल नहीं किया जा सका। इसलिए नींद की समस्या और कम कामकाजी जीवन के बीच संबंध को समझने के लिए आगे और शोध की जरूरत है।
--आईएएनएस
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