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एनएसई के 30,000 करोड़ रुपए के आईपीओ पर उठ रहे सवाल, एक दशक की देरी और ऑप्शंस कारोबार में सुस्ती बनी चुनौती

नई दिल्ली, 7 जुलाई (आईएएनएस)। देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का प्रस्तावित 30,000 करोड़ रुपए का प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा शेयर इश्यू माना जा रहा है। हालांकि यह आईपीओ करीब एक दशक की देरी के बाद सामने आ रहा है। इस देरी की मुख्य वजह को-लोकेशन विवाद रही।

नई दिल्ली, 7 जुलाई (आईएएनएस)। देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का प्रस्तावित 30,000 करोड़ रुपए का प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा शेयर इश्यू माना जा रहा है। हालांकि यह आईपीओ करीब एक दशक की देरी के बाद सामने आ रहा है। इस देरी की मुख्य वजह को-लोकेशन विवाद रही।

अब जब एक्सचेंज लिस्टिंग की तैयारी कर रहा है, तब डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग पर हाल में लगाए गए नियामकीय प्रतिबंधों के कारण उसकी आय, मुनाफे और बाजार हिस्सेदारी पर असर पड़ा है, जिससे इस बहुप्रतीक्षित आईपीओ को लेकर नए सवाल भी खड़े हो गए हैं। यह जानकारी वैल्यू रिसर्च की रिपोर्ट में दी गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा मामला वर्ष 2010 से 2014 के बीच सामने आए को-लोकेशन विवाद से जुड़ा है। आरोप था कि कुछ ब्रोकर्स एनएसई के डेटा सेंटर में बैकअप सर्वर से पहले जुड़ जाते थे, जिससे उन्हें अन्य निवेशकों की तुलना में कुछ मिलीसेकेंड पहले बाजार संबंधी जानकारी मिल जाती थी। फॉरेंसिक ऑडिट में इस पैटर्न की पुष्टि हुई, जिसके बाद सेबी ने जांच शुरू की।

जब एनएसई ने वर्ष 2016 में अपना ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस दाखिल किया, तब तक यह मामला पूरी तरह सुलझा नहीं था। नियामकीय अनिश्चितता के कारण आईपीओ की प्रक्रिया रोक दी गई और इसके बाद मामला कई वर्षों तक सेबी की कार्रवाई, अपीलीय न्यायाधिकरण और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब यह मामला अंतिम चरण में है। एनएसई ने सेबी के साथ 1,491 करोड़ रुपए के संशोधित सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा है, जिसे मंजूरी मिलने की संभावना जताई जा रही है। इसके बाद आईपीओ का रास्ता साफ होता दिख रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022 में आशीष चौहान की एनएसई में वापसी ने आईपीओ प्रक्रिया को फिर से गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चौहान एनएसई की संस्थापक टीम का हिस्सा रहे हैं और बाद में उन्होंने बीएसई की 2017 की लिस्टिंग का नेतृत्व भी किया था। उनकी वापसी से एक्सचेंज की नियामकीय विश्वसनीयता मजबूत हुई और लंबे समय से अटका आईपीओ दोबारा पटरी पर आया।

इस दौरान, जबकि एनएसई सूचीबद्ध नहीं हो सका, उसके कारोबार में तेज विस्तार हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में एक्सचेंज की आय लगभग 9 गुना बढ़ी। वर्ष 2016 में कुल आय में ट्रांजैक्शन चार्ज की हिस्सेदारी 49.5 प्रतिशत थी, जो बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 78.7 प्रतिशत हो गई। इसका सबसे बड़ा कारण डेरिवेटिव्स, खासकर ऑप्शंस ट्रेडिंग में आई जबरदस्त वृद्धि रही।

आज एनएसई की कुल परिचालन आय का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा ऑप्शंस ट्रेडिंग से आता है। लेकिन यही क्षेत्र अब नियामकीय निगरानी में है। सेबी के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में 91 प्रतिशत रिटेल फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडर्स को शुद्ध नुकसान हुआ, जिसकी कुल राशि करीब 1.1 लाख करोड़ रुपए रही।

इसी को देखते हुए सेबी ने वर्ष 2024 से डेरिवेटिव्स बाजार में कई बदलाव लागू किए, जिनमें दोनों एक्सचेंजों के सात साप्ताहिक एक्सपायरी दिनों को घटाकर एक करना, एनएसई के निफ्टी की एक्सपायरी मंगलवार और बीएसई के सेंसेक्स की एक्सपायरी गुरुवार तय करना, कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाना और एक्सपायरी के समय अतिरिक्त मार्जिन लागू करना शामिल है।

वित्त वर्ष 2026 इन नए नियमों के तहत पूरा संचालन करने वाला पहला साल रहा। इस दौरान एनएसई की परिचालन आय में करीब 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि समायोजित शुद्ध लाभ 17 प्रतिशत घटकर 9,101 करोड़ रुपए रह गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 10,978 करोड़ रुपए था।

इसी अवधि में इक्विटी ऑप्शंस बाजार में एनएसई की हिस्सेदारी भी 97 प्रतिशत से घटकर 75 प्रतिशत पर आ गई।

रिपोर्ट के अनुसार, इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि एनएसई की आय अभी भी काफी हद तक ऑप्शंस कारोबार पर निर्भर है। अन्य व्यवसायिक गतिविधियां इतनी बड़ी नहीं हैं कि वे इस गिरावट की भरपाई कर सकें।

हालांकि एक्सचेंज की कुल आय का शेष 21 प्रतिशत हिस्सा डेटा फीड्स, लिस्टिंग फीस, इंडेक्स लाइसेंसिंग और को-लोकेशन चार्जेज से आता है। ये अपेक्षाकृत स्थिर और नियमित आय के स्रोत हैं और इनमें लगातार वृद्धि भी देखी जा रही है।

--आईएएनएस

डीबीपी

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