एआई इंसानों की जगह नहीं लेगा, बल्कि कार्यक्षमता को बढ़ाएगा: करण अदाणी
नई दिल्ली, 21 फरवरी (आईएएनएस)। अदाणी पोर्ट्स और एसईजेड लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर (एमडी) करण अदाणी ने शनिवार को कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इंसानों की जगह नहीं लेगा, बल्कि यह कार्यक्षमता (दक्षता) बढ़ाने का काम करेगा, जिससे कम लोग अधिक आउटपुट दे पाएंगे।
राष्ट्रीय राजधानी में अखिल भारतीय प्रबंधन संघ द्वारा आयोजित प्लेटिनम जयंती (70वें) स्थापना दिवस और 20वें राष्ट्रीय प्रबंधन दिवस के कार्यक्रम में बोलते हुए, करण अदाणी ने कहा कि एआई को एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए जो उत्पादकता में सुधार करता है और संगठनों को तेजी से आगे बढ़ने में मदद करता है।
हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि प्रौद्योगिकी को बड़े पैमाने पर अपनाने से कौशल विकास प्रणालियों के पूरी तरह विकसित होने से पहले अस्थायी रूप से रोजगार में कमी आ सकती है।
उन्होंने कहा, “बड़े संगठनों की यह जिम्मेदारी है कि वे संरचित परिवर्तन प्रबंधन के हिस्से के रूप में कर्मचारियों को पुनः प्रशिक्षित और उन्नत कौशल प्रदान करें।”
अपने प्रारंभिक जीवन पर विचार साझा करते हुए, करण अदाणी ने बताया कि उन्होंने मिशनरी स्कूल में तीन महत्वपूर्ण वर्ष बिताए, जहां उन्होंने अनुशासन, आत्मनिर्भरता और विभिन्न पृष्ठभूमियों के बच्चों के साथ संवाद करने का महत्व सीखा।
उन्होंने फॉर्मूला 1 के प्रति अपने जुनून के बारे में भी बात की, जिससे उनका परिचय सिंगापुर में दोस्तों के माध्यम से हुआ था।
उन्होंने कहा कि इस खेल में हर मिलीसेकंड काफी महत्व रखता है, खासकर उस दौर में जब माइकल शूमाकर का दबदबा था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि उनके पिता इसे एक खर्चीला शौक मानते हैं।
फॉर्मूला 1 की भारत में वापसी की संभावना के बारे में बात करते हुए, करण अदाणी ने कहा कि वैश्विक खेल आयोजनों की मेजबानी से अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलती है।
उन्होंने कहा,“हालांकि, फिलहाल इस तरह के अवसर सीमित संख्या में लोगों को ही मिलते हैं, इसीलिए कई भारतीय रेस देखने के लिए दोहा, सऊदी अरब और सिंगापुर जैसे स्थानों की यात्रा करते हैं।”
करण अदानी ने कहा, “भारत में एफ1 की मेजबानी दोबारा करने की प्रबल क्षमता है और अगर ऐसा होता है, तो इससे भारतीय विरासत को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया जा सकेगा।”
अपने पेशेवर सफर के बारे में बात करते हुए, करण अदाणी ने बताया कि कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने पिता को बताया कि उन्हें बंदरगाह व्यवसाय में रुचि है।
उसी रात उन्हें मुंद्रा बंदरगाह भेज दिया गया। उन्होंने बताया कि उनका पहला साल बिना किसी कार्यालय या डेस्क के जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीता।
उन्होंने विभिन्न परिचालन क्षेत्रों का दौरा किया, समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप से समझा और इसे एक गहन ज्ञानवर्धक और व्यावहारिक अनुभव बताया।
--आईएएनएस
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