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गुप्त नवरात्रि के नौ दिन करें ये अमोघ उपाय, हर क्षेत्र में मिलेगी सफलता

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ज्योतिष न्यूज़ डेस्क: हिंदू धर्म में कई सारे पर्व और त्योहार मनाए जाते है और सभी का अपना महत्व होता है वही नवरात्रि का पर्व भी खास माना जाता है वर्ष में कुल चार नवरात्रि पड़ती है जिसमें दो गुप्त नवरात्रि होती है जो कि चैत्र और शारदीय नवरात्रि से बिल्कुल अलग होती है गुप्त नवरात्रि माघ मास में मनाई जाती है

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इस साल गुप्त नवरात्रि का आरंभ कल यानी 22 जनवरी दिन रविवार से हो चुका है और आज गुप्त नवरात्रि का दूसरा दिन है, मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि में देवी सती से प्रकट हुई दस महाविद्याओं की पूजा की जाती है ये दिन इन्हीं को समर्पित है।

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शास्त्र अनुसार गुप्त नवरात्रि में गुप्त तरीके से इन महाविद्याओं की साधना करने से जातक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। इस दौरान कुछ उपायों को करने से हर क्षेत्र में तरक्की व सफलता मिलती है वही कारोबार और करियर में उन्नति भी होती है तो आज हम आपको उन्हीं उपायों के बारे में बता रहे है तो आइए जानते है।    

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अमोघ उपाय—
शास्त्र और ज्योतिष अनुसार गुप्त नवरात्रि के दौरान सामान्य जीवन जीने वाले जातकों को नौ दिनों तक देवी मां दुर्गा के सामने दो घी का दीपक जलाना चाहिए और साथ ही माता की विधिवत पूजा करते हुए श्री कीलक स्तोत्र का संपूर्ण पाठ करना चाहिए मान्यता है कि ये चमत्कारी पाठ नौकरी, कारोबार में आने वाली हर अड़चन व बाधा दूर करता है, जो साधक इसका पाठ कर रहे है उन्हें इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और तामसिक भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। 

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कीलक स्तोत्र पाठ—

ॐ अस्य श्री कीलक स्तोत्र महामंत्रस्य। शिव ऋषि:। अनुष्टुप् छन्द:

महासरस्वती देवता। मंत्रोदित देव्यो बीजम्। नवार्णो मंत्रशक्ति।

श्री सप्तशती मंत्र स्तत्वं स्री जगदम्बा प्रीत्यर्थे सप्तशती पाठाङ्गत्वएन जपे विनियोग:।

ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे। श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे।।1।।

सर्वमेतद्विजानीयान्मंत्राणामभिकीलकम्। सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जप्यतत्परः।।2।।

सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि। एतेन स्तुवतां देवीं स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति।।3।।

न मंत्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते। विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम्।।4।।

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशङ्कामिमां हरः। कृत्वा निमंत्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम्।।5।।

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः। समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्निमंत्रणाम्।।6।।

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेव न संशयः। कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः।।7।।

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति। इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम्।।8।।

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्। स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः।।9।।

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते। नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात्।।10।।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति। ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः।।11।।

सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद् दृश्यते ललनाजने। तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जप्यमिदम् शुभम्।।12।।

शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत्।।13।।

ऐश्वर्यं तत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः। शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः।।14।।

।।इति श्रीभगवत्याः कीलकस्तोत्रं समाप्तम्।।

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