“भारत का तेल, भारत का फैसला”: ऊर्जा नीति पर किसी बाहरी दबाव को नहीं मानेगा भारत
वैश्विक राजनीति और आर्थिक तनाव के बीच भारत की ऊर्जा नीति को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। खासतौर पर रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों की आलोचना के बीच भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह अपने ऊर्जा स्रोतों का फैसला स्वयं करेगा। भारत का रुख स्पष्ट है—ऊर्जा खरीद का निर्णय राष्ट्रीय हित, कीमत और उपलब्धता के आधार पर लिया जाएगा।
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85–88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में देश के लिए सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक तेल बाजार में बड़े बदलाव आए। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद रूस ने अपना तेल एशियाई देशों, विशेषकर भारत और चीन, को रियायती दरों पर बेचना शुरू किया। भारत ने भी अवसर का लाभ उठाते हुए रूसी तेल का आयात बढ़ाया। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को सस्ती ऊर्जा मिली, जिससे घरेलू महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिली।
हालांकि, इस फैसले को लेकर अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों ने भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की। कई बार यह तर्क दिया गया कि रूस से तेल खरीदना यूक्रेन युद्ध के दौरान मॉस्को को आर्थिक सहायता देना है। लेकिन भारत का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है और इस मामले में वह किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।
भारत सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। भारत अमेरिका, यूरोप और रूस—सभी के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए रखना चाहता है। यही कारण है कि भारत ने ऊर्जा खरीद के मामले में “मल्टी-सोर्स स्ट्रैटेजी” अपनाई है, यानी वह विभिन्न देशों से तेल खरीदकर अपने आयात स्रोतों को विविध बनाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की ऊर्जा नीति व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित है। भारत तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है और उद्योग, परिवहन तथा बिजली उत्पादन के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है। ऐसे में अगर किसी देश से सस्ता और स्थिर तेल उपलब्ध होता है तो उसे खरीदना आर्थिक दृष्टि से स्वाभाविक है।
इसके अलावा भारत लंबे समय से “ऊर्जा आत्मनिर्भरता” और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रहा है। सरकार जैव ईंधन, सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दे रही है ताकि भविष्य में आयात पर निर्भरता कम की जा सके।
विश्लेषकों के अनुसार, बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की रणनीति स्पष्ट है—वह वैश्विक साझेदारियों को बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा। यही कारण है कि भारत लगातार यह संदेश दे रहा है कि ऊर्जा और व्यापार से जुड़े फैसले किसी दूसरे देश के निर्देश पर नहीं, बल्कि भारत की जरूरतों और हितों के आधार पर ही लिए जाएंगे।

