फर्जी सर्टिफिकेट से नौकरी मामलों में सख्ती के बीच हाईकोर्ट की टिप्पणी: दिव्यांग को बार-बार परीक्षण के लिए बुलाने पर जताई नाराज़गी
फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरियों में चयन से जुड़े मामलों की बढ़ती शिकायतों के बीच राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा है कि जांच और सत्यापन के नाम पर किसी भी दिव्यांग व्यक्ति को बार-बार बुलाना कानून का दुरुपयोग माना जा सकता है और इससे बचा जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां एक ओर फर्जी प्रमाण पत्रों की जांच आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर वास्तविक दिव्यांग व्यक्तियों को अनावश्यक प्रक्रियाओं और बार-बार के परीक्षणों के जरिए परेशान नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि प्रशासन को संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच प्रक्रिया पारदर्शी भी रहे और मानवीय भी।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि यदि किसी अभ्यर्थी के दस्तावेज पहले ही सक्षम चिकित्सा बोर्ड द्वारा प्रमाणित किए जा चुके हैं, तो उसे बार-बार अलग-अलग स्तर पर बुलाना उचित नहीं है, जब तक कि किसी ठोस संदेह का आधार न हो। अदालत ने इसे “कानून के दुरुपयोग” की श्रेणी में रखे जाने की संभावना भी जताई।
यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा बताया जा रहा है, जिनमें आरोप लगाया गया था कि कुछ अभ्यर्थियों ने फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरियां प्राप्त की हैं। इसी के चलते विभिन्न विभागों में व्यापक सत्यापन अभियान चलाया जा रहा है। हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान कई वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवारों को बार-बार मेडिकल परीक्षण के लिए बुलाए जाने की शिकायतें सामने आई थीं।
अदालत ने यह भी कहा कि सरकार और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है कि वे फर्जीवाड़े को रोकने के लिए मजबूत और प्रभावी प्रणाली विकसित करें, लेकिन इसके लिए निर्दोष और वास्तविक लाभार्थियों को अनावश्यक परेशानी नहीं दी जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने संकेत दिया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता के साथ-साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है, खासकर उन मामलों में जहां व्यक्ति शारीरिक रूप से दिव्यांग हो और पहले ही प्रमाणित हो चुका हो।
इस टिप्पणी के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि राज्य प्रशासन दिव्यांगता प्रमाण पत्रों के सत्यापन की प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित और एकीकृत करेगा, ताकि एक ही व्यक्ति को बार-बार अलग-अलग स्तर पर परीक्षण के लिए न बुलाया जाए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में दिशा-निर्देश तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जिससे एक ओर फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी और दूसरी ओर वास्तविक लाभार्थियों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित होगी।
फिलहाल, राजस्थान हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक संतुलित संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जो जांच प्रक्रिया और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

