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Theatre Culture: साउथ में क्यों कायम है सिनेमाघरों का क्रेज, नॉर्थ में महंगे टिकट और प्रीमियम थिएटर बने चुनौती
 

Theatre Culture: साउथ में क्यों कायम है सिनेमाघरों का क्रेज, नॉर्थ में महंगे टिकट और प्रीमियम थिएटर बने चुनौती

 

 

 

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के तेजी से बढ़ने के बाद फिल्मों को देखने का तरीका बदल गया है. अब दर्शकों को थिएटर रिलीज के कुछ समय बाद ही नई फिल्में घर बैठे देखने का विकल्प मिल जाता है. इसके बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों में सिनेमाघरों को लेकर दर्शकों का रुझान एक जैसा नहीं है. साउथ के कई बाजारों में थिएटर कल्चर अभी भी मजबूत बना हुआ है, जबकि नॉर्थ के कई इलाकों में दर्शकों की सिनेमाघरों तक पहुंच पहले की तुलना में कम हुई है.
टिकट की कीमत का बड़ा असर
ट्रेड एनालिस्ट गिरीश वानखेड़े के मुताबिक, साउथ और नॉर्थ के थिएटर बाजारों में टिकट की कीमतों का बड़ा अंतर है. उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में बताया कि साउथ के कई हिस्सों में टिकट की कीमतों पर एक तय सीमा लागू रहती है. इससे दर्शकों के लिए थिएटर में फिल्म देखना अपेक्षाकृत किफायती रहता है.
उनके अनुसार, कम टिकट कीमतों का असर ऑक्यूपेंसी पर भी दिखाई देता है और कई थिएटरों में नियमित रूप से अच्छी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं. वहीं, नॉर्थ के कई बाजारों में टिकट की कीमतों पर ऐसी सीमाएं कम दिखाई देती हैं, जिससे थिएटर में फिल्म देखने का खर्च बढ़ जाता है.
प्रीमियम थिएटर से आम दर्शक की दूरी
थिएटर कारोबारी विशेक चौहान का मानना है कि समस्या को केवल टिकट की कीमतों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता. उनके मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में कई मल्टीप्लेक्स खुद को प्रीमियम और लाइफस्टाइल एक्सपीरियंस के तौर पर पेश करने लगे हैं.
ऐसे थिएटरों में टिकट के साथ-साथ खाने-पीने और अन्य सुविधाओं पर भी खर्च बढ़ सकता है. इसका असर उन परिवारों पर पड़ता है जो नियमित रूप से फिल्म देखने का बजट नहीं बना पाते. चौहान के अनुसार, अगर थिएटर ऐसे विकल्प उपलब्ध कराएं जहां आम परिवार कम खर्च में फिल्म देख सके, तो दर्शकों की संख्या बढ़ाने में मदद मिल सकती है.


पहले ज्यादा फिल्में, अब चुनिंदा रिलीज
चौहान के मुताबिक, थिएटर में फिल्म देखने की लागत बढ़ने का असर दर्शकों की आदत पर भी पड़ा है. पहले जो दर्शक साल में 10-12 फिल्में देखने थिएटर जाते थे, वे अब कई बार सिर्फ एक-दो बड़ी या पसंदीदा फिल्मों के लिए ही सिनेमाघर पहुंचते हैं.
इस बदलाव के बीच ओटीटी ने दर्शकों को घर पर मनोरंजन का आसान विकल्प भी उपलब्ध कराया है. ऐसे में थिएटर तक दर्शकों को खींचने के लिए सिर्फ फिल्म की रिलीज काफी नहीं रह गई है, बल्कि टिकट की कीमत और पूरे सिनेमाई अनुभव की भी भूमिका बढ़ गई है.
साउथ में कंटेंट की ज्यादा विविधता
साउथ के बाजारों में थिएटर बिजनेस को मजबूत बनाए रखने वाली एक वजह भाषाई विविधता भी मानी जाती है. विशेक चौहान के अनुसार, दक्षिण भारत के कई बाजारों में दर्शक स्थानीय भाषा की फिल्मों के अलावा तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़, हिंदी और हॉलीवुड फिल्मों को भी देखते हैं.
इसके मुकाबले नॉर्थ इंडिया के कई बाजार लंबे समय तक मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों पर अधिक निर्भर रहे हैं. अलग-अलग भाषाओं की फिल्मों के लिए पर्याप्त दर्शक मिलने से साउथ के थिएटरों के पास कंटेंट के ज्यादा विकल्प उपलब्ध रहते हैं.
थिएटर इंडस्ट्री के सामने नई चुनौती
ओटीटी के दौर में सिनेमाघरों के सामने चुनौती सिर्फ डिजिटल प्लेटफॉर्म से मुकाबले की नहीं है. टिकट की कीमत, थिएटर का माहौल, कंटेंट की विविधता और दर्शकों की पहुंच जैसे कई कारक मिलकर तय करते हैं कि लोग कितनी बार सिनेमाघर जाएंगे.
ऐसे में थिएटर कारोबार के लिए आम दर्शकों को ध्यान में रखकर किफायती टिकट और अलग-अलग तरह के कंटेंट उपलब्ध कराना आने वाले समय में अहम भूमिका निभा सकता है.
 

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