The Vvaan Review: 'पंचायत' के मेकर की 'द वन' रिलीज, जानें कैसी है सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की मिस्ट्री थ्रिलर
सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ 25 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। खास बात यह है कि पहली बार सिद्धार्थ और तमन्ना की जोड़ी बड़े पर्दे पर साथ नजर आ रही है। फिल्म में मनीष पॉल, श्वेता तिवारी, सुनील ग्रोवर और अनूप सोनी भी महत्वपूर्ण किरदारों में दिखाई देते हैं।
फिल्म का निर्देशन दीपक कुमार मिश्रा ने किया है, जिन्हें ‘पंचायत’ जैसी लोकप्रिय सीरीज के लिए जाना जाता है। फिल्म का निर्माण बालाजी टेलीफिल्म्स के बैनर तले शोभा कपूर और एकता कपूर ने किया है। फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने के बाद आइए जानते हैं कि आखिर ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ कैसी है और क्या इसे देखने के लिए सिनेमाघर जाना चाहिए।
क्या है ‘द वन’ की कहानी?
फिल्म की शुरुआत सातवीं शताब्दी की कहानी से होती है। कहानी देवांचल के रहस्यमयी जंगल की है, जहां एक वन देवी का मंदिर मौजूद है। मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद इस जंगल में किसी के जाने की मनाही है। लेकिन देवांचल के राजा को एक मजबूरी के चलते रात के समय जंगल में जाना पड़ता है और यहीं से कहानी रहस्य और रोमांच की तरफ मुड़ जाती है।
इसके बाद फिल्म की कहानी सीधे साल 2026 में पहुंचती है। सिद्धार्थ मल्होत्रा फिल्म में ऋषि का किरदार निभा रहे हैं। ऋषि छुट्टी लेकर गोवा जाना चाहता है, लेकिन परिवार की वजह से उसे छठ के मौके पर घर जाना पड़ता है। इसी बीच कहानी में ऐसे हालात बनते हैं कि उसकी जिंदगी देवांचल और वहां मौजूद रहस्यों से जुड़ जाती है।
तमन्ना भाटिया फिल्म में ऋषि की पत्नी के किरदार में हैं। दोनों पति-पत्नी की जिंदगी में एक बड़ा दर्द है। कोई शारीरिक परेशानी नहीं होने के बावजूद वे माता-पिता नहीं बन पा रहे हैं और आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से IVF का खर्च उठाना भी उनके लिए आसान नहीं है।
इसके बाद दोनों देवांचल छोड़ने का फैसला करते हैं। इसी बीच वन देवी के मंदिर और जंगल के रहस्य का पता लगाने के लिए एक पत्रकार जंगल में पहुंचता है, लेकिन वहां जाकर लापता हो जाता है। दूसरी तरफ ऋषि भी जंगल से जुड़े एक ऐसे रहस्य में फंस जाता है, जिसकी परतें धीरे-धीरे खुलती हैं।
फिल्म में जंगल के अपने रहस्य हैं, राज परिवार के अपने राज हैं और इन दोनों के बीच कई अनसुलझे सवाल खड़े होते हैं। कहानी में आगे क्या होता है, इसके लिए फिल्म देखनी होगी।
हालांकि, फिल्म का पहला हिस्सा जिस तरह दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ाता है, सेकंड हाफ में वही पकड़ कमजोर पड़ जाती है। कहानी कई जगह भटकती हुई महसूस होती है और शुरुआत में बनाए गए रहस्य का असर अंत तक उसी स्तर पर कायम नहीं रह पाता। फिल्म को सरल रखने की कोशिश की गई है, लेकिन कई घटनाएं लॉजिक से परे जाती दिखाई देती हैं।
दीपक कुमार मिश्रा का डायरेक्शन कैसा है?
दीपक कुमार मिश्रा ने ‘पंचायत’ में गांव और लोकजीवन से जुड़ी कहानियों को जिस अंदाज में पेश किया, उसकी झलक ‘द वन’ में भी दिखाई देती है। उन्होंने एक लोककथा को आधुनिक कहानी के साथ जोड़ने की कोशिश की है।
फिल्म में छठ पर्व और आस्था को भी कहानी का अहम हिस्सा बनाया गया है। भक्ति और लोकविश्वास को कहानी में पिरोने की कोशिश नजर आती है और छठी मैया से जुड़े प्रसंग भी फिल्म को अलग रंग देते हैं।
डायरेक्शन की शुरुआत काफी प्रभावी लगती है, लेकिन सेकंड हाफ में कहानी को और मजबूती की जरूरत महसूस होती है। अगर दूसरे हिस्से की कहानी और स्क्रीनप्ले पर ज्यादा काम किया जाता, तो फिल्म का प्रभाव और बेहतर हो सकता था।
कुल मिलाकर दीपक कुमार मिश्रा ने इसे एक ऐसी लोककथा के अंदाज में पेश किया है, जिसकी याद पुराने दौर की कॉमिक्स और फैंटेसी कहानियों से आती है।
एक्टिंग में किसने किया प्रभावित?
सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ऋषि के किरदार को गंभीरता के साथ निभाने की कोशिश की है। उनके किरदार में भावनात्मक संघर्ष भी है और कहानी के रहस्य से जुड़ा रोमांच भी। तमन्ना भाटिया ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया है और दोनों की ऑन-स्क्रीन जोड़ी कहानी में एक भावनात्मक पहलू जोड़ती है।
मनीष पॉल फिल्म में कॉमेडी का तड़का लगाते हैं और उनकी टाइमिंग कई जगह हंसाती है। सुलभा आर्या के साथ उनकी केमिस्ट्री भी मजेदार लगती है।
वहीं सुनील ग्रोवर फिल्म के सरप्राइज पैकेज के तौर पर सामने आते हैं। उनका किरदार कहानी में अलग तरह की ऊर्जा लेकर आता है।
‘द वन’ देखनी चाहिए या नहीं?
‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ लोककथा, रहस्य, आस्था और फैंटेसी को एक साथ लेकर चलने वाली फिल्म है। अगर आपको ऐसी कहानियां पसंद हैं, जिनमें जंगल, रहस्य, लोकविश्वास और फैंटेसी का मिश्रण हो, तो फिल्म आपको पसंद आ सकती है।
सिद्धार्थ मल्होत्रा या तमन्ना भाटिया के फैन हैं, तो भी फिल्म को एक मौका दिया जा सकता है। दीपक कुमार मिश्रा का कहानी कहने का अंदाज पसंद है, तो फिल्म आपके लिए दिलचस्प हो सकती है।
हालांकि, अगर आप फिल्म में हर घटना के पीछे मजबूत लॉजिक तलाशते हैं, तो कुछ हिस्से आपको निराश कर सकते हैं। फिल्म की शुरुआत और कॉन्सेप्ट दिलचस्प है, लेकिन सेकंड हाफ उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाता।

