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पिता चाहते थे सरकारी नौकरी, 'रहीम चाचा' ने चुनी टेलरिंग, इस तरह बनाई फिल्मों में खास पहचान

मुंबई, 25 अगस्त (आईएएनएस)। दिवंगत अभिनेता ए.के. हंगल पर्दे पर अक्सर किसी बुजुर्ग, पिता, चाचा या आम आदमी के किरदार में नजर आए, लेकिन असल जिंदगी की उनकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी। आज लोग उन्हें 'शोले' के रहीम चाचा और उनके मशहूर डायलॉग 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई' के लिए जानते हैं, मगर सिनेमा तक पहुंचने से पहले हंगल ने आजादी की लड़ाई, जेल, थिएटर और दर्जी के काम से जुड़ा लंबा सफर तय किया था।

मुंबई, 25 अगस्त (आईएएनएस)। दिवंगत अभिनेता ए.के. हंगल पर्दे पर अक्सर किसी बुजुर्ग, पिता, चाचा या आम आदमी के किरदार में नजर आए, लेकिन असल जिंदगी की उनकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी। आज लोग उन्हें 'शोले' के रहीम चाचा और उनके मशहूर डायलॉग 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई' के लिए जानते हैं, मगर सिनेमा तक पहुंचने से पहले हंगल ने आजादी की लड़ाई, जेल, थिएटर और दर्जी के काम से जुड़ा लंबा सफर तय किया था।

खास बात यह थी कि उनके पिता सरकारी नौकरी में थे और चाहते थे कि बेटा भी नौकरी करे, लेकिन हंगल ने सुरक्षित नौकरी के बजाय अपनी राह खुद चुनने का फैसला किया।

ए.के. हंगल का पूरा नाम अवतार किशन हंगल था। उनका जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनका बचपन और युवावस्था पेशावर में बीता। परिवार का माहौल ऐसा था कि सरकारी नौकरी उनके लिए एक स्वाभाविक रास्ता हो सकता था, लेकिन हंगल का झुकाव शुरू से ही अलग था। वह कम उम्र में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। 1929 से 1947 के बीच उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।

उन्होंने सरकारी नौकरी की बजाय दर्जी का काम सीखा और पेशावर में टेलर बन गए। उनका यह काम केवल रोजी-रोटी तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने वहां काम करने वाले दूसरे दर्जियों की परेशानियों को समझा और उनके लिए ट्रेड यूनियन बनाने की कोशिश की। वह मजदूरों को संगठित करने और उनके हक की बात करने में जुटे थे। बाद में उन्होंने बताया कि वह स्वतंत्रता सेनानी थे और सरकारी नौकरी नहीं करना चाहते थे।

दर्जी का काम करते हुए भी उनका मन रंगमंच में लगा रहता था। 1936 में वह पेशावर के एक थिएटर ग्रुप से जुड़े और नाटकों में अभिनय करने लगे। आजादी के आंदोलन के साथ-साथ थिएटर उनके जीवन का अहम हिस्सा बनता गया। 1940 के दशक में वह कम्युनिस्ट और मजदूर आंदोलनों से भी जुड़े रहे। इसी वजह से उन्हें कराची में जेल भी जाना पड़ा। जेल से निकलने के बाद वह भारत आ गए और मुंबई में बस गए।

मुंबई आने के बाद हंगल ने थिएटर को गंभीरता से अपनाया। वह इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (आईपीटीए) से जुड़े। यहां उनका साथ बलराज साहनी और कैफी आजमी जैसे कलाकारों से हुआ। करीब डेढ़ दशक तक थिएटर में काम करने के बाद वह फिल्मों की तरफ बढ़े। जब वह फिल्मों में पहुंचे तब उनकी उम्र 52 साल थी। 1966 में बसु भट्टाचार्य की फिल्म 'तीसरी कसम' से उन्होंने हिंदी फिल्मों में कदम रखा।

52 साल की उम्र में फिल्मी करियर शुरू करना उस दौर में भी आसान नहीं था, लेकिन हंगल ने जल्द ही अपनी अलग जगह बना ली। 'गुड्डी', 'बावर्ची', 'अभिमान', 'नमक हराम', 'चुपके चुपके', 'आंधी', 'तपस्या', 'शौकीन', 'अवतार' और 'अर्जुन' जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसे किरदार निभाए, जो कहानी को मजबूती देते थे। राजेश खन्ना के साथ भी उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। उनके किरदार अक्सर साधारण आदमी के होते थे, लेकिन अभिनय इतना असरदार होता था कि दर्शक उन्हें भूल नहीं पाते थे।

फिर 1975 में आई 'शोले' ने उनकी पहचान को हमेशा के लिए बदल दिया। फिल्म में उन्होंने रहीम चाचा का किरदार निभाया और उनका डायलॉग 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई' आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार डायलॉग्स में गिना जाता है। उन्होंने 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। 'लगान' में शंभू काका का किरदार भी उनके यादगार कामों में शामिल रहा।

2006 में भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।

हंगल टीवी पर भी नजर आए और अपने करियर के अंतिम दौर में 'मधुबाला-एक इश्क एक जुनून' में दिखाई दिए। 2012 में उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। 26 अगस्त 2012 को मुंबई में उनका निधन हो गया।

--आईएएनएस

पीके/एबीएम

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