Nana Patekar Legacy: संघर्ष से रंगमंच और सिनेमा तक, ऐसे बदली नाना पाटेकर ने अभिनय की परिभाषा
भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी पहचान सिर्फ उनकी फिल्मों से नहीं बनती, बल्कि उनकी पूरी अभिनय शैली एक अलग स्कूल की तरह नजर आती है। नाना पाटेकर भी ऐसे ही कलाकार थे। 75 साल की उम्र में गोवा में कार्डियक अरेस्ट के बाद उनके निधन की खबर ने हिंदी और मराठी सिनेमा को गहरा झटका दिया। करीब पांच दशक के करियर में उन्होंने थिएटर, गंभीर सिनेमा, मुख्यधारा की फिल्मों और निर्देशन तक अपनी अलग पहचान बनाई।
उनकी खासियत यह रही कि उन्होंने खुद को पारंपरिक हीरो की छवि तक सीमित नहीं किया। कभी खलनायक, कभी विद्रोही युवक, कभी पुलिस अधिकारी, कभी सैनिक तो कभी कॉमेडी किरदार—नाना ने हर भूमिका में अपनी अलग छाप छोड़ी।
संघर्ष से शुरू हुआ था नाना का सफर
नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। शुरुआती जीवन आर्थिक मुश्किलों से भरा रहा। उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से पढ़ाई की और संघर्ष के दौर में अपने परिवार की मदद के लिए पोस्टर पेंटिंग जैसे काम भी किए।
उनके जीवन के शुरुआती अनुभवों ने उन्हें आम आदमी की परेशानियों और सामाजिक असमानता को करीब से समझने का मौका दिया। यही अनुभव आगे चलकर उनके कई किरदारों में दिखाई दिए।
इसके बाद उन्होंने विज्ञापन की दुनिया में काम किया, लेकिन जल्द ही रंगमंच की ओर उनका झुकाव बढ़ गया। थिएटर ने उन्हें अभिनय का वह अनुशासन दिया, जिसने बाद में उनके फिल्मी करियर की नींव मजबूत की।
मराठी रंगमंच बना अभिनय की असली पाठशाला
फिल्मों में पहचान बनाने से पहले नाना पाटेकर ने मराठी थिएटर में लंबा समय बिताया। रंगमंच पर काम करने के दौरान उन्होंने संवाद, आवाज, बॉडी लैंग्वेज और मौन के इस्तेमाल को बेहद बारीकी से साधा।
उनकी अभिनय शैली में संवाद बोलने से ज्यादा महत्वपूर्ण कई बार संवाद के बीच का ठहराव दिखाई देता था। छोटे-छोटे वाक्यों, अचानक रुकने और आवाज के उतार-चढ़ाव के जरिए वह किरदार के भीतर चल रहे तनाव को सामने लाते थे।
यही थिएटर की ट्रेनिंग बाद में कैमरे के सामने उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
‘गमन’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर
नाना पाटेकर ने 1978 में ‘गमन’ से फिल्मी सफर की शुरुआत की। इसके बाद वह धीरे-धीरे समानांतर और गंभीर सिनेमा में अपनी जगह बनाते गए।
‘अंकुश’, ‘सलाम बॉम्बे!’, ‘परिंदा’ और ‘क्रांतिवीर’ जैसी फिल्मों ने उन्हें एक ऐसे अभिनेता के रूप में स्थापित किया, जो सिर्फ संवाद बोलने के बजाय किरदार को भीतर तक जीने की कोशिश करता था। ‘सलाम बॉम्बे!’ में उनके काम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा।
‘परिंदा’ और ‘क्रांतिवीर’ ने बदली पहचान
विदु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ में नाना ने अंडरवर्ल्ड डॉन का किरदार निभाया। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इसके बाद ‘क्रांतिवीर’ में प्रताप नारायण तिलक का किरदार उनके करियर के सबसे चर्चित प्रदर्शनों में शामिल हुआ। फिल्म में उनके तीखे संवाद और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर आधारित अभिनय ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बेहद लोकप्रिय बनाया। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
‘खामोशी’ में आवाज के बिना किया कमाल
नाना की अभिनय क्षमता का एक अलग उदाहरण ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में देखने को मिला। यहां उन्हें ऐसा किरदार निभाना था जिसमें संवादों की भूमिका बेहद सीमित थी।
जिस अभिनेता की पहचान दमदार आवाज और तीखी संवाद अदायगी से बनी थी, उसने चेहरे के भाव, आंखों और बॉडी लैंग्वेज के जरिए भावनाओं को व्यक्त किया। यह भूमिका उनके अभिनय के दूसरे पक्ष को सामने लेकर आई।
गंभीर किरदारों से ‘वेलकम’ तक
नाना पाटेकर ने खुद को सिर्फ गंभीर फिल्मों तक सीमित नहीं रखा। ‘अब तक छप्पन’ और ‘अपहरण’ जैसी फिल्मों में उन्होंने गंभीर और प्रभावशाली भूमिकाएं निभाईं, तो दूसरी तरफ ‘वेलकम’ और ‘वेलकम बैक’ में उदय शेट्टी के किरदार से उन्होंने कॉमेडी में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
उनकी खासियत यह थी कि शैली बदलने के बावजूद उनकी स्क्रीन प्रेजेंस कमजोर नहीं हुई। यही वजह रही कि अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों ने उनके काम को पसंद किया।
‘प्रहार’ से निर्देशन तक का सफर
नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं थे। उन्होंने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ में उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाली।
फिल्म में सैनिकों के जीवन और प्रशिक्षण को ज्यादा यथार्थवादी अंदाज में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई थी। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि नाना के लिए सिनेमा केवल अभिनय तक सीमित नहीं था।
मराठी सिनेमा में ‘नटसम्राट’ का यादगार अध्याय
मराठी सिनेमा में ‘नटसम्राट’ उनके करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है। वी. वा. शिरवाडकर के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित इस फिल्म में नाना ने गणपतराव ‘अप्पासाहेब’ बेलवलकर का किरदार निभाया।
एक उम्रदराज रंगमंच अभिनेता के जीवन, परिवार, अकेलेपन और टूटते आत्मविश्वास को उन्होंने बेहद भावनात्मक अंदाज में पर्दे पर उतारा। यह भूमिका उनके थिएटर और सिनेमा के अनुभवों के संगम के रूप में भी देखी गई।
अभिनय के साथ सामाजिक सरोकार भी रहे अहम
नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रही। महाराष्ट्र में किसानों और ग्रामीण परिवारों की समस्याओं को लेकर उन्होंने सामाजिक काम भी किया।
2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ NAAM Foundation की शुरुआत की। संस्था का फोकस सूखे से प्रभावित किसानों, ग्रामीण विकास और जल संरक्षण जैसे क्षेत्रों पर रहा। संस्था के अनुसार इसकी शुरुआत महाराष्ट्र में किसानों की परेशानियों और बढ़ती आत्महत्याओं के बीच हुई थी।
पुरस्कारों से भी मिली पहचान
नाना पाटेकर को उनके अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों सहित कई सम्मान मिले। उन्हें 2013 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। गंभीर सिनेमा से लेकर व्यावसायिक फिल्मों तक उनके योगदान ने उन्हें हिंदी और मराठी दोनों फिल्म इंडस्ट्री में अलग स्थान दिलाया।
नाना पाटेकर की विरासत क्या होगी?
नाना पाटेकर की विरासत किसी एक फिल्म, एक संवाद या एक किरदार तक सीमित नहीं है। उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद यह रही कि उन्होंने साबित किया कि अभिनेता को प्रभावशाली बनने के लिए पारंपरिक स्टारडम या ग्लैमरस छवि की जरूरत नहीं होती।
रंगमंच से मिली कठोर ट्रेनिंग, जीवन के संघर्षों से निकली संवेदनशीलता और किरदार को पूरी तीव्रता से निभाने की क्षमता ने उनकी अपनी अभिनय भाषा तैयार की। यही वजह है कि ‘परिंदा’ के अन्ना से लेकर ‘क्रांतिवीर’ के प्रताप नारायण तिलक, ‘नटसम्राट’ के अप्पासाहेब और ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी तक उनके किरदार आज भी अलग-अलग वजहों से याद किए जाते हैं।
नाना पाटेकर का निधन एक कलाकार की जिंदगी का अंत जरूर है, लेकिन उनके निभाए किरदार, संवाद और अभिनय की शैली भारतीय सिनेमा के इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का हिस्सा बने रहेंगे।

