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यादों में उस्ताद : पिता का अल्टीमेटम, अब्दुल रशीद खान ने चुना सुरों का रास्ता और बने महान गायक

मुंबई, 18 अगस्त (आईएएनएस)। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उस्ताद अब्दुल रशीद खान का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने सुरों से कई पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध किया। उनकी जिंदगी मेहनत, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण की मिसाल है।

मुंबई, 18 अगस्त (आईएएनएस)। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उस्ताद अब्दुल रशीद खान का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने सुरों से कई पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध किया। उनकी जिंदगी मेहनत, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण की मिसाल है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि बचपन में उन्हें कुश्ती का भी उतना ही शौक था, जितना संगीत का। एक समय ऐसा भी आया, जब उनके पिता ने साफ कह दिया कि उन्हें कुश्ती और संगीत में से किसी एक रास्ते को चुनना होगा। उस्ताद ने संगीत को चुना और इसी फैसले ने आगे चलकर उन्हें देश के सबसे बड़े शास्त्रीय गायकों में शामिल कर दिया।

उस्ताद अब्दुल रशीद खान का जन्म 19 अगस्त 1908 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के सलोन कस्बे में एक संगीत परिवार में हुआ था। वह सुर और राग के बीच बड़े हुए। उन्होंने अपने पिता से संगीत की शुरुआती शिक्षा ली। बाद में चांद खान, बरखुदार खान और मेहताब खान जैसे गुरुओं ने भी उन्हें तालीम दी।

संगीत के साथ-साथ उन्हें कुश्ती का भी बहुत शौक था। उस समय उत्तर प्रदेश के पहलवान काफी प्रसिद्ध हुआ करते थे और अब्दुल रशीद भी अखाड़े की ओर आकर्षित थे। लेकिन उनके पिता को डर था कि कुश्ती से गर्दन या गले पर असर पड़ सकता है और इससे गायकी को नुकसान हो सकता है। तब पिता ने उनसे कहा कि उन्हें कुश्ती और संगीत में से किसी एक को चुनना होगा। अब्दुल रशीद खान ने संगीत का रास्ता चुना और फिर पूरी जिंदगी उसी में रम गए। यही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

उस्ताद अब्दुल रशीद खान ने सालों तक रियाज किया। बताया जाता है कि वह रात में कई-कई घंटे अभ्यास करते थे। उनकी गायकी में ग्वालियर घराने की परंपरा साफ दिखाई देती थी, लेकिन उन्होंने अपनी अलग शैली भी विकसित की। खयाल गायकी के अलावा उन्होंने ध्रुपद, धमार और ठुमरी जैसी विधाओं में भी महारत हासिल की। वे गायक ही नहीं, बल्कि रचनाकार और कवि भी थे। उनकी कई रचनाओं को आकाशवाणी और अन्य संस्थानों ने सुरक्षित रखा।

कोलकाता की आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी में उन्होंने लंबे समय तक टीचर के रूप में काम किया और कई बच्चों को संगीत सिखाया। वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के नियमित कलाकार भी रहे। देशभर के बड़े संगीत समारोहों में उनकी प्रस्तुतियों को खूब सराहा गया। उम्र बढ़ने के बाद भी उनका संगीत के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ। अंतिम दिनों तक वे शिष्यों को तालीम और मंच पर प्रस्तुति देते रहे।

उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी सम्मान, बंग विभूषण और कई अन्य पुरस्कारों से नवाजा गया। वर्ष 2012 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। वह पद्म सम्मान पाने वाले सबसे अधिक उम्र के व्यक्तियों में शामिल थे।

18 फरवरी 2016 को कोलकाता में 107 वर्ष की आयु में उस्ताद अब्दुल रशीद खान का निधन हो गया।

--आईएएनएस

पीके/एबीएम

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