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किरदार बदले, कहानी वही: जब बड़े पर्दे पर 'जुड़वां' निकलीं दो अलग-अलग फिल्में

नई दिल्ली, 1 मई (आईएएनएस)। आज फिल्मी शुक्रवार है और शुक्रवार का दिन हिंदी सिनेमा के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि सालों से इसी दिन पर्दे पर नई फिल्में रिलीज होती हैं, जो न सिर्फ किसी अभिनेता या निर्देशक का करियर निर्धारित करती हैं बल्कि इकोनॉमी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
किरदार बदले, कहानी वही: जब बड़े पर्दे पर 'जुड़वां' निकलीं दो अलग-अलग फिल्में

नई दिल्ली, 1 मई (आईएएनएस)। आज फिल्मी शुक्रवार है और शुक्रवार का दिन हिंदी सिनेमा के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि सालों से इसी दिन पर्दे पर नई फिल्में रिलीज होती हैं, जो न सिर्फ किसी अभिनेता या निर्देशक का करियर निर्धारित करती हैं बल्कि इकोनॉमी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

हर शुक्रवार को सिनेमाघर की खिड़की पर कई कहानियां दर्शकों को देखने को मिलती हैं, लेकिन क्या हो अगर एक ही महीने में 2 हफ्ते के अंतराल में एक ही कहानी देखने को मिल जाए तो?

90 के दशक में ऐसा हुआ, जब सिनेमाघरों में एक ही महीने में ऐसी दो फिल्में रिलीज की गईं, जिनकी कहानी एक जैसी थी, लेकिन किरदार अलग थे। हम बात कर रहे हैं 1990 के दशक में जुलाई के महीने में रिलीज हुई फिल्मों 'जुर्म' और 'हार जीत' की। दोनों फिल्मों की कहानी एक थी, लेकिन किरदार अलग थे, और हैरान कर देने वाली बात यह भी रही कि दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया।

पहले बात करते हैं फिल्म 'जुर्म' की। 13 जुलाई की रिलीज हुई जुर्म में विनोद खन्ना इंस्पेक्टर शेखर वर्मा का रोल प्ले किया, जो अपनी पत्नी मीनाक्षी शेषाद्रि से बहुत प्यार करता है लेकिन एक केस की गवाह यानी संगीता बिजलानी की मदद करते-करते उसके प्यार में पड़ जाता है। फिल्म में शादी के बाद के अवैध संबंध को गलती बताया गया है, हालांकि अंत में भावनात्मक संघर्ष से गुजरने के बाद विनोद खन्ना मीनाक्षी शेषाद्रि का दिल फिर जीत लेते हैं। इस फिल्म का निर्देशन महेश भट्ट ने किया था और फिल्म साल की हिट फिल्मों में शामिल हुई थी।

जुलाई के महीने में ही 2 हफ्ते बाद यानी 27 जुलाई को, पर्दे पर दस्तक देती है 'हार जीत'। फिल्म का नाम और किरदार भले ही अलग हैं, लेकिन दोनों फिल्मों की कहानी बिल्कुल सेम। 'हार जीत' में कबीर बेदी, माधवी और फराह नाज़ को जुर्म की तरह लव-ट्राएंगल में दिखाया गया, जब कबीर बेदी शादीशुदा होते हुए भी विवाहोत्तर संबंध में लिप्त होते हैं। फिल्म दो रिश्तों के बीच के भावनात्मक संघर्ष को बखूबी दिखाती है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि यह दोनों ही फिल्में अंग्रेजी फिल्म 'समवन टू वॉच ओवर मी' की कहानी से प्रेरित है। हालांकि एक जैसी कहानी होने के बाद भी दोनों की फिल्मों का दर्शकों का प्यार मिला।

--आईएएनएस

पीएस/पीएम

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