कादर खान स्पेशल: मस्जिदों के बाहर गुजरी गरीबी, कब्रिस्तान से मिली पहली फिल्म... सिर्फ एक शब्द न कहने पर अमिताभ से खत्म हुआ रिश्ता!
“हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है…” अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया यह मशहूर डायलॉग हिंदी सिनेमा के यादगार संवादों में गिना जाता है। इसके पीछे जिस कलम का जादू था, वह कादर खान की थी। अपनी दमदार अदाकारी, शानदार कॉमेडी और बेहतरीन डायलॉग राइटिंग से करोड़ों लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले कादर खान की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी।
22 अक्टूबर 1937 को अफगानिस्तान के काबुल में जन्मे कादर खान ने गरीबी और मुश्किलों के बीच अपना बचपन बिताया। हालात ऐसे थे कि उन्हें कभी मस्जिद के बाहर भीख मांगनी पड़ी, लेकिन उनकी मां ने उन्हें पढ़ाई छोड़ने नहीं दी। यही संघर्ष आगे चलकर उन्हें बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय कलाकारों में शामिल करने वाला साबित हुआ।
तीन भाइयों की मौत के बाद भारत आया परिवार
कादर खान के बचपन की कहानी दर्द से भरी थी। उनके तीन बड़े भाइयों की बचपन में ही मौत हो गई थी। बच्चों को खोने के डर से उनकी मां ने परिवार को अफगानिस्तान छोड़कर भारत आने के लिए कहा। इसके बाद परिवार मुंबई के कमाठीपुरा इलाके में आकर रहने लगा।
यहां परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। घर में पैसों की कमी और पारिवारिक तनाव के बीच कादर खान का बचपन बीता। जब वह महज दो साल के थे, तभी उनके पिता परिवार से अलग हो गए। इसके बाद मां पर बच्चों को पालने और घर चलाने की जिम्मेदारी आ गई।
भूख से परेशान होकर मस्जिद के बाहर मांगते थे भीख
घर में खाने तक के पैसे नहीं होते थे। कादर खान को पता चला कि उनके पिता मुंबई की एक मस्जिद में इमाम हैं। जब घर में खाना नहीं होता, तो वह कई किलोमीटर पैदल चलकर पिता के पास पहुंचते और उनसे दो रुपये मांगते थे।
लेकिन कई बार पिता भी पैसे देने में असमर्थता जताते थे। ऐसे में छोटे कादर को मस्जिद के बाहर भीख मांगनी पड़ती थी। जो खाना या पैसे मिलते, उसी से उनका गुजारा होता। कई बार उन्हें भूखे पेट भी रात बितानी पड़ती थी।
मां ने मजदूरी करने से रोका, कहा- तुम पढ़ाई करो
आर्थिक तंगी के कारण एक समय कादर खान ने पढ़ाई छोड़कर कारखाने में मजदूरी करने का मन बना लिया था। उन्हें लगा कि कुछ रुपये कमाकर परिवार की मदद कर सकेंगे। लेकिन उनकी मां ने उन्हें रोक लिया।
मां ने समझाया कि कुछ रुपये कमाने के लिए पढ़ाई छोड़ना सही नहीं होगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि घर की मुश्किलों से वह खुद लड़ेंगी, लेकिन कादर को अपनी शिक्षा जारी रखनी चाहिए।
मां की इस सीख ने कादर खान की जिंदगी की दिशा बदल दी। उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की। बाद में वह मुंबई के एम.एच. साबू सिद्दीक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाने भी लगे।
कब्रिस्तान में बोलते थे फिल्मी डायलॉग, वहीं मिला पहला मौका
कादर खान को बचपन से ही लोगों की आवाज की नकल उतारने और फिल्मी डायलॉग बोलने का शौक था। वह अक्सर भीड़ से दूर कब्रिस्तान में जाकर अपनी कला का अभ्यास करते थे।
एक दिन उनकी आवाज थिएटर से जुड़े अशरफ खान ने सुन ली। कादर की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्होंने उन्हें नाटक में काम करने का मौका दिया। यहीं से उनके अभिनय के सफर की शुरुआत हुई।
नाटकों में काम करने के साथ-साथ कादर खान ने लेखन और निर्देशन में भी अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। उनकी प्रतिभा धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया के लोगों तक पहुंचने लगी।
सिर्फ तीन घंटे में लिख दिए फिल्म के डायलॉग
कादर खान की जिंदगी का एक बड़ा मोड़ तब आया, जब फिल्ममेकर नरेंद्र बेदी ने उन्हें फिल्म ‘जवानी दीवानी’ के संवाद लिखने का मौका दिया। शुरुआत में कादर खान को संदेह था कि वह फिल्मों के लिए डायलॉग लिख पाएंगे या नहीं, लेकिन निर्देशक ने उनकी लेखन क्षमता पर भरोसा जताया।
स्क्रिप्ट मिलने के बाद कादर खान मरीन ड्राइव पहुंचे और लिखना शुरू कर दिया। महज तीन घंटे में वह पूरे डायलॉग लिखकर निर्देशक के पास पहुंच गए। नरेंद्र बेदी उनके काम को देखकर हैरान रह गए और उनकी तारीफ की।
इस काम के लिए कादर खान को 1,500 रुपये मिले। इसके बाद उनके लिए फिल्मों में संवाद लिखने के नए रास्ते खुल गए।
दिलीप कुमार ने भी पहचाना हुनर
कादर खान के नाटकों की चर्चा बॉलीवुड तक पहुंच चुकी थी। मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार ने भी उनके अभिनय की तारीफ सुनी और उनका नाटक देखने की इच्छा जताई।
नाटक देखने के बाद दिलीप कुमार ने कादर खान को अपनी फिल्मों ‘सगीना’ और ‘बैराग’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। कादर खान ने इसे स्वीकार कर लिया। हालांकि, उनकी पहली फिल्म के तौर पर राजेश खन्ना की ‘दाग’ (1973) का नाम लिया जाता है, जिसमें उन्होंने वकील की भूमिका निभाई थी।
इसके बाद उन्होंने अभिनय और संवाद लेखन, दोनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई।
300 से ज्यादा फिल्मों में किया काम
कादर खान ने अपने करियर में लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया और 250 से अधिक फिल्मों के संवाद लिखे। उनकी लेखनी ने कई फिल्मों को यादगार बना दिया।
‘अमर अकबर एंथनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’, ‘शराबी’, ‘कुली’, ‘सत्ते पे सत्ता’, ‘कुली नंबर 1’ और ‘साजन चले ससुराल’ जैसी फिल्मों में उनके काम को खूब पसंद किया गया।
गोविंदा के साथ उनकी कॉमेडी जोड़ी भी दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय रही। उनकी संवाद अदायगी और हास्य अभिनय ने हिंदी सिनेमा में एक अलग पहचान बनाई।
अमिताभ बच्चन से दोस्ती में आई दूरी
कादर खान और अमिताभ बच्चन ने कई फिल्मों में साथ काम किया। कादर खान ने अमिताभ की कई चर्चित फिल्मों के संवाद भी लिखे। दोनों के बीच अच्छी दोस्ती थी, लेकिन एक किस्से के मुताबिक, अमिताभ के राजनीति में आने के बाद उनके रिश्तों में दूरी बढ़ गई।
बताया जाता है कि एक कार्यक्रम में जब एक निर्माता ने कादर खान से अमिताभ को ‘सर जी’ कहकर संबोधित करने के लिए कहा, तो उन्होंने जवाब दिया कि अमित उनके दोस्त हैं। इस घटना के बाद दोनों के बीच पहले जैसी नजदीकी नहीं रही। हालांकि, इस किस्से से जुड़ी बातों को अलग-अलग इंटरव्यू और बयानों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
कई पुरस्कार मिले, 2018 में दुनिया को कहा अलविदा
कादर खान को उनके शानदार लेखन के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। उन्हें ‘मेरी आवाज सुनो’ (1982) और ‘अंगार’ (1993) के लिए सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्म ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला।
31 दिसंबर 2018 को कनाडा में 81 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें 2019 में मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
कादर खान की जिंदगी इस बात की मिसाल है कि गरीबी और मुश्किल हालात किसी इंसान की प्रतिभा को हमेशा के लिए नहीं रोक सकते। जिस कलाकार ने बचपन में भूख और अभाव झेले, उसी ने आगे चलकर अपने संवादों और अभिनय से करोड़ों लोगों को हंसाया और हिंदी सिनेमा में अमिट छाप छोड़ दी।

