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'पहला नशा' से शाहरुख के नगमों तक: जानिए उस शायर की कहानी जिसने नेहरू के दौर में जेल जाना मंजूर किया, पर कलम नहीं झुकाई

'पहला नशा' से शाहरुख के नगमों तक: जानिए उस शायर की कहानी जिसने नेहरू के दौर में जेल जाना मंजूर किया, पर कलम नहीं झुकाई

‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया…’

इन पंक्तियों को पढ़कर शायद ही कोई अंदाजा लगा पाए कि इन्हें लिखने वाला शायर सिर्फ गंभीर और संजीदा शायरी तक सीमित नहीं था। फिल्मों में जब उनकी कलम चली तो मोहब्बत, जवानी और रिश्तों को ऐसे शब्द मिले, जिन्हें आज भी लोग गुनगुनाते हैं।

‘पहला नशा, पहला खुमार…’, ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा…’, ‘साथिया तूने क्या किया…’ और ‘ऐ काश कि हम होश में अब आने न पाएं…’ जैसे गीत कई पीढ़ियों की यादों का हिस्सा बन चुके हैं।

ये गीत लिखने वाले थे मजरूह सुल्तानपुरी, जिनकी कलम ने हिंदी सिनेमा को हजारों यादगार गीत दिए। उनकी गीतों की दुनिया इतनी बड़ी है कि ‘आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा’ से लेकर ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ तक, उनके लिखे कई गाने आज भी पुराने नहीं लगे।

लेकिन मजरूह की कहानी सिर्फ फिल्मी गीतों तक सीमित नहीं थी। उनकी कलम में मोहब्बत थी तो बगावत भी थी। सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत उन्होंने जेल जाकर चुकाई, लेकिन अपने विचारों से समझौता नहीं किया।

1 अक्टूबर 1919 को जन्मे मजरूह सुल्तानपुरी की 107वीं जयंती के मौके पर जानिए उस शायर की कहानी, जिसकी कलम ने दर्द, मोहब्बत और बगावत—तीनों को आवाज दी।

मदरसे से शुरू हुई पढ़ाई, बन गए हकीम

मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को ब्रिटिश इंडिया के सुल्तानपुर में हुआ था। उनका असली नाम सरारुल हसन खान था। बाद में सुल्तानपुर के नाम पर उन्होंने अपना नाम मजरूह सुल्तानपुरी रखा।

उनके पिता पुलिस विभाग में थे और अंग्रेजी शिक्षा के खिलाफ थे। इसलिए मजरूह की पढ़ाई मदरसे में हुई, जहां उन्होंने उर्दू, अरबी और फारसी सीखी।

बड़े होने पर मजरूह की दिलचस्पी गायिकी और शायरी में बढ़ने लगी, लेकिन पिता चाहते थे कि बेटा मेडिकल की पढ़ाई करे। आखिरकार उन्हें लखनऊ के तामील-उल-तिब यूनानी मेडिसिन कॉलेज में दाखिला लेना पड़ा।

पढ़ाई पूरी करने के बाद वह हकीम बन गए, लेकिन उनके मन में शायरी और संगीत की दुनिया ही बसी हुई थी।

एक प्रेम कहानी ने थमा दी कलम

कहा जाता है कि एक दिन एक तहसीलदार की बेटी की नब्ज देखते हुए मजरूह को उससे मोहब्बत हो गई। दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई, लेकिन लड़की के पिता को जब इस रिश्ते की भनक लगी तो उन्होंने दोनों को अलग कर दिया।

दिल टूटा तो मजरूह ने अपने दर्द को कागज पर उतारना शुरू किया। धीरे-धीरे यही शब्द शायरी में बदलने लगे।

उन्होंने अपना तखल्लुस रखने की कोशिश की, लेकिन एक दोस्त ने उन्हें ‘मजरूह’ नाम सुझाया। मजरूह का अर्थ होता है—घायल। इसके बाद उन्होंने अपनी शायरी के नीचे मजरूह लिखना शुरू कर दिया।

जिगर मुरादाबादी ने बनाया अपना शागिर्द

1941 में सुल्तानपुर में एक मुशायरा हुआ। मजरूह भी अपनी डायरी लेकर वहां पहुंच गए। जैसे ही उन्होंने अपनी शायरी सुनाई, महफिल में वाह-वाह होने लगी।

उनकी शायरी सुनने वालों में मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी भी मौजूद थे। जिगर मुरादाबादी उनकी शायरी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मजरूह को अपना शागिर्द बना लिया।

जिगर जैसे उस्ताद का साथ मिलने के बाद मजरूह ने हकीमगिरी छोड़कर पूरी तरह शायरी को अपना लिया।

फिल्मी दुनिया में आने का किस्सा भी दिलचस्प है

एक मुशायरे में जिगर मुरादाबादी और मजरूह सुल्तानपुरी दोनों मौजूद थे। इसी दौरान मशहूर फिल्म निर्माता कारदार साहब ने जिगर से अपनी फिल्म ‘शाहजहां’ के लिए गाने लिखने को कहा।

जिगर ने खुद फिल्मी गीत लिखने से इनकार कर दिया और मजरूह की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह नौजवान शायर फिल्म के लिए गीत लिख सकता है।

मजरूह पहले तैयार नहीं थे। वह साहित्य और अदब की दुनिया में बड़ा नाम बनना चाहते थे। लेकिन जिगर मुरादाबादी ने उन्हें समझाया कि जिंदगी में आगे परिवार और जिम्मेदारियां भी आएंगी और सिर्फ शायरी से घर चलाना मुश्किल हो सकता है।

उस्ताद की बात मानकर मजरूह ने ‘शाहजहां’ के लिए दो गीत लिखे—

‘गम दिए मुस्तकिल, कितना नाजुक है दिल…’

और

‘जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे…’

इन गीतों ने मजरूह के फिल्मी सफर की शुरुआत कर दी।

के.एल. सहगल से जुड़ी यादगार कहानी

मशहूर गायक के.एल. सहगल ने जब ‘जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे’ गीत सुना तो वह इससे बेहद प्रभावित हुए।

बताया जाता है कि उन्होंने इच्छा जताई थी कि उनकी अंतिम यात्रा के दौरान यही गीत बजाया जाए। 18 जनवरी 1947 को उनके निधन के बाद उनकी अंतिम विदाई में यह गीत बजाया गया।

‘अंदाज’ ने दिलाई बड़ी पहचान

‘शाहजहां’ के बाद मजरूह ने कई फिल्मों के लिए गीत लिखे। इनमें ‘नाटक’, ‘डोली’ और ‘अंजुमन’ जैसी फिल्में शामिल थीं।

हालांकि उन्हें बड़ी पहचान महबूब खान की 1949 में आई फिल्म ‘अंदाज’ से मिली। फिल्म में नरगिस, दिलीप कुमार और राज कपूर नजर आए थे और इसके गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे।

इसके बाद वह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रमुख गीतकारों में शामिल होते चले गए।

जब नेहरू के खिलाफ कविता लिखने पर जेल गए

मजरूह सुल्तानपुरी की जिंदगी में एक दौर ऐसा भी आया जब उनकी कलम ने उन्हें जेल पहुंचा दिया।

1949 में वह मजदूर आंदोलन में शामिल हुए। वहां उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की आलोचना करते हुए एक कविता पढ़ी, जिसमें उन्होंने नेहरू के लिए बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया।

इसके बाद मजरूह सुल्तानपुरी को गिरफ्तार कर ऑर्थर रोड जेल भेज दिया गया। उनके सामने विकल्प रखा गया कि वह माफी मांगें या दो साल की सजा भुगतें।

मजरूह ने माफी मांगने के बजाय जेल जाना स्वीकार किया।

जेल में रहने के दौरान उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी खराब थी। इसी बीच उनकी पहली बेटी का जन्म हुआ। परिवार की मदद के लिए उन्होंने जेल में रहते हुए कुछ फिल्मों के लिए गीत लिखने की हामी भरी और उससे मिलने वाली रकम परिवार तक पहुंचाई।

करीब दो साल बाद वह जेल से बाहर आए।

करीब 350 फिल्मों के लिए लिखे गीत

मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने लंबे करियर में करीब 350 फिल्मों के लिए गीत लिखे। उनके लिखे गीतों में ‘कयामत से कयामत तक’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘अकेले हम अकेले तुम’, ‘दिल आशना है’, ‘अंदाज अपना अपना’, ‘खामोशी’, ‘दरार’, ‘जानम समझा करो’, ‘क्या कहना’ और ‘पुकार’ जैसी फिल्मों के गीत शामिल रहे।उनकी कलम ने अलग-अलग दौर के कलाकारों और संगीतकारों के साथ काम किया और कई गीत लोगों की यादों का हिस्सा बन गए।

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार

मजरूह सुल्तानपुरी को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए 1993 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वह यह सम्मान पाने वाले पहले गीतकार बने।उनका फिल्मी सफर उनकी जिंदगी के आखिरी दौर तक जारी रहा। शाहरुख खान स्टारर ‘वन टू का फोर’ के लिए भी उन्होंने गीत लिखे, हालांकि यह फिल्म उनके निधन के बाद रिलीज हुई।

24 मई 2000 को हुआ निधन

मजरूह सुल्तानपुरी का 24 मई 2000 को 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। बताया गया कि उनकी मौत फेफड़ों से संबंधित बीमारी के चलते हुई।उनके सम्मान में सुल्तानपुर में ‘मजरूह सुल्तानपुरी उद्यान’ बनाया गया है और शहर के प्रवेश मार्ग पर उनके नाम का गेट भी बनाया गया है।मजरूह सुल्तानपुरी की जिंदगी इस बात की मिसाल रही कि एक कलम कभी सिर्फ मोहब्बत की कहानी नहीं लिखती—वही कलम जरूरत पड़ने पर समाज और सत्ता के सामने सवाल भी खड़े कर सकती है।उनके गीतों में प्रेम था, दर्द था, जिंदगी थी और वक्त के साथ चलने वाली ऐसी भावनाएं थीं, जिन्हें कई पीढ़ियां आज भी अपने अंदाज में गुनगुनाती हैं।

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