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दोस्तों की सलाह पर बिना माता-पिता को बताए पुणे पहुंचे थे 'मझले सरकार', हर फिल्म में दिखी दमदार उपस्थिति

नई दिल्ली, 15 मार्च (आईएएनएस)। समय गुजरता रहेगा, मगर सिनेमा जगत के कुछ सितारे ऐसे हैं, जिनकी चमक कभी खत्म नहीं होगी। ऐसे ही सितारे हैं 'साहिब बीबी और गुलाम' के मझले सरकार... जी हां! भारतीय सिनेमा के दिग्गज चरित्र अभिनेता दया किशन सप्रू, जिन्हें उनके प्रशंसक 'सप्रू' के नाम से जानते हैं। अपनी दमदार उपस्थिति और गहन अभिनय से उन्होंने कई पीढ़ियों के दिलों में जगह बनाई।
दोस्तों की सलाह पर बिना माता-पिता को बताए पुणे पहुंचे थे 'मझले सरकार', हर फिल्म में दिखी दमदार उपस्थिति

नई दिल्ली, 15 मार्च (आईएएनएस)। समय गुजरता रहेगा, मगर सिनेमा जगत के कुछ सितारे ऐसे हैं, जिनकी चमक कभी खत्म नहीं होगी। ऐसे ही सितारे हैं 'साहिब बीबी और गुलाम' के मझले सरकार... जी हां! भारतीय सिनेमा के दिग्गज चरित्र अभिनेता दया किशन सप्रू, जिन्हें उनके प्रशंसक 'सप्रू' के नाम से जानते हैं। अपनी दमदार उपस्थिति और गहन अभिनय से उन्होंने कई पीढ़ियों के दिलों में जगह बनाई।

उनकी सबसे यादगार भूमिका 1962 की क्लासिक फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' में मझले सरकार (चौधरी) की थी, जहां कम संवादों के बावजूद उनकी खूंखार और प्रभावशाली मौजूदगी ने दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ी।

सप्रू का जन्म 16 मार्च 1916 को जम्मू-कश्मीर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम दया किशन सप्रू था। परिवार बड़ा था, जिसमें चार भाई और दो बहनें थीं। उनके पिता डोगरा राज्य के खजांची थे और महाराजा हरि सिंह के समय में कार्यरत थे। उनके परिवार के दो घर थे एक जम्मू में और दूसरा लाहौर में। पढ़ाई उर्दू और हिंदी माध्यम में हुई, लेकिन अंग्रेजी में दिलचस्पी होने की वजह से उन्होंने खुद से अंग्रेजी सीखी। बचपन से संगीत का शौक था। लाहौर में बड़े होने के बाद उन्होंने ठेकेदार की नौकरी की और जालंधर कैंट में 2-3 साल रहे भी।

अभिनय की दुनिया में उनके आने का किस्सा भी दिलचस्प है। सप्रू लुक से न केवल खूबसूरत थे, बल्कि उनकी आवाज भी दमदार थी। एक दिन ऐसे ही बातों-बातों में कॉलेज के दोस्तों ने उनकी खूबसूरती और दमदार आवाज देखकर फिल्मों में जाने की सलाह दी। दोस्तों की बात मानकर वह बिना माता-पिता को बताए पुणे चले गए। वहां प्रभात स्टूडियो के मालिक वी. शांताराम, शेख फतेहलाल और बाबूराव से उनकी मुलाकात हुई। इसके बाद उन्हें साल 1944 में आई मराठी फिल्म 'रामशास्त्री' में छोटा सा रोल मिला। बाद में हिंदी में डेब्यू 'चंद' से हुआ। शुरू में हीरो के रूप में 'लखा रानी' में मोनिका देसाई के साथ उन्होंने काम भी किया। उस समय उनकी सैलरी ढाई से तीन हजार रुपए महीना थी।

धीरे-धीरे सप्रू के अभिनय, खूबसूरती और दमदार आवाज ने उन्हें सिनेमा जगत में स्थापित कर दिया। वह अक्सर सख्त जज, पुलिस कमिश्नर, जमींदार या खलनायक के किरदार निभाते थे। 'साहिब बीबी और गुलाम' में मझले सरकार की भूमिका उनके करियर की सबसे चर्चित रही। गुरुदत्त की इस फिल्म में उनकी डायलॉग डिलीवरी और मौजूदगी आज भी याद की जाती है।

कम ही लोग जानते हैं कि 'पाकीजा' में मूल रूप से अशोक कुमार का किरदार उन्हें मिलना था, लेकिन बाद में वह विलेन के किरदार के लिए चुने गए। अन्य प्रमुख फिल्मों में 'ज्वेल थीफ', 'देवार', 'हीर रांझा', 'मुझे जीने दो' आदि रहीं।

सप्रू की दोस्ती देव आनंद, गुरुदत्त और रहमान से थी। वे सुबह 5 बजे उठकर रियाज करते थे ताकि आवाज मजबूत रहे। बाद में वह होम्योपैथिक डॉक्टर भी बन गए। साल 1948 में उन्होंने अभिनेत्री हेमवती से शादी की। उनके तीन बच्चे हैं, बेटी प्रीति सप्रू (पंजाबी-हिंदी अभिनेत्री), बेटा तेज सप्रू (अभिनेता) और बेटी रीमा राकेश नाथ (स्क्रिप्ट राइटर)।

20 अक्टूबर 1979 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। इससे पहले कैंसर हुआ था, जो ठीक हो गया था, लेकिन तनाव ने उनकी जान ले ली। उनकी स्मृति में, साल 2024 में अंधेरी (मुंबई) में फन रिपब्लिक रोड को 'श्री दया किशन सप्रू मार्ग' नाम दिया गया।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी

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