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सिनेमैटोग्राफर हेमंत चतुर्वेदी ने सुनाया डॉ. अशोक असवानी का मजेदार किस्सा

मुंबई, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। कभी आपने सुना है कि किसी डॉक्टर ने मरीज को दवा देने के साथ फिल्में देखने की सलाह दी हो। गुजरात के कच्छ में एक छोटा सा गांव आदिपुर में एक आयुर्वेदिक डॉक्टर थे, जिनकी दवाइयों में एक अलग ही जादू होता था। वे अपने मरीजों की दवाइयों की पर्ची पर पूजा भट्ट का नाम लिखा करते थे।
सिनेमैटोग्राफर हेमंत चतुर्वेदी ने सुनाया डॉ. अशोक असवानी का मजेदार किस्सा

मुंबई, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। कभी आपने सुना है कि किसी डॉक्टर ने मरीज को दवा देने के साथ फिल्में देखने की सलाह दी हो। गुजरात के कच्छ में एक छोटा सा गांव आदिपुर में एक आयुर्वेदिक डॉक्टर थे, जिनकी दवाइयों में एक अलग ही जादू होता था। वे अपने मरीजों की दवाइयों की पर्ची पर पूजा भट्ट का नाम लिखा करते थे।

पूजा भट्ट के पॉडकास्ट में हाल ही में मशहूर सिनेमैटोग्राफर हेमंत चतुर्वेदी ने शिरकत की। इसमें उन्होंने पूजा भट्ट को चार्ली डॉक्टर का दिलचस्प किस्सा सुनाया। पूजा ने इंस्टाग्राम पर एक क्लिप शेयर किया।

जिसमें वे पूजा से कहते हैं, "गुजरात के कच्छ जिले में एक छोटा सा गांव है आदिपुर। वहां कभी एक अनोखे डॉक्टर रहते थे, जिनका नाम था डॉ. अशोक असवानी। लोग उन्हें प्यार से 'चार्ली डॉक्टर' कहते थे। दरअसल, वे आयुर्वेदिक डॉक्टर थे, लेकिन उनकी दवाइयों में एक अलग ही जादू था। मरीज जल्दी ठीक महसूस करने लगते थे।"

उन्होंने बताया, "डॉ. असवानी चार्ली चैप्लिन के बहुत बड़े फैन थे और उनकी नकल भी करते थे। हर साल 16 अप्रैल को चार्ली चैप्लिन के जन्मदिन के मौके पर डॉक्टर एक रैली निकाला करते थे। इसमें गांव के कई लोग चार्ली चैप्लिन की तरह टोपी, मूंछ और छड़ी लेकर पूरे इलाके में घूमते थे। फिर, चार्ली चैप्लिन के चेहरे वाला केक काटा जाता और उनकी फिल्में दिखाई जातीं थी।"

सिनेमैटोग्राफर ने उनकी मजेदार कहानी सुनाई। उन्होंने कहा, "अगर कोई मरीज उदास, परेशान या हल्का डिप्रेशन महसूस करता हुआ आता, तो डॉक्टर साहब एक अनोखा इलाज देते थे। वे दवाई की पर्ची पर ‘पूजा भट्ट’ का नाम लिखते थे। साथ में चार्ली चैप्लिन की दो मशहूर फिल्मों, 'मॉडर्न टाइम्स' और 'द ट्रैम्प', का जिक्र करते थे। नीचे साफ-साफ लिखते थे, दिन में 3 बार देखना।"

उन्होंने अपनी बात को खत्म करते हुए कहा, "फिर वे अपनी दराज से चार्ली चैप्लिन की फिल्मों की वीसीडी निकालकर मरीज को दे देते और कहते कि इन्हें नियमित देखो। मजेदार बात यह थी कि जो लोग उदास होकर उनके पास आते थे, वे इन फिल्मों को देखने के बाद बिल्कुल तरोताजा और खुश हो जाते थे।"

--आईएएनएस

एनएस/एबीएम

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