‘हीरो को तो नंगा दिखा नहीं सकते…’: बॉलीवुड में महिलाओं के साथ भेदभाव पर स्मिता पाटिल ने खडे किए सवाल
बॉलीवुड की इतिहासकार और अभिनेत्री स्मिता पाटिल हमेशा ही अपनी भूमिकाओं और अपने बेबाक विचारों के लिए जानी जाती थीं। 1980 और 1990 के दशक में जब भारतीय सिनेमा में स्त्रियों की भूमिकाएं अक्सर सीमित और परंपरागत ढांचे में बंधी रहती थीं, स्मिता ने उस समय खुले तौर पर महिलाओं के साथ भेदभाव और अनुचित बर्ताव पर सवाल उठाया।
स्मिता पाटिल का कहना था कि फिल्म उद्योग में महिला अभिनेत्रियों के साथ अक्सर असमान व्यवहार किया जाता है। वे कहती थीं, “हीरो को तो नंगा दिखा नहीं सकते, लेकिन महिला कलाकार को उसकी मरजी के बिना कई बार प्रोजेक्ट में जोखिम भरे दृश्य करने पड़ते हैं।”
स्मिता के इस बयान ने उस समय फिल्म जगत में हलचल मचा दी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल नाटकीय दृश्य या संवेदनशील सीन ही नहीं, बल्कि फिल्मों में सशक्त भूमिका और स्क्रिप्ट में सम्मान भी महिलाओं के साथ अक्सर अनदेखी किया जाता है। उनके अनुसार, बॉलीवुड की इस “हीरो-सेंट्रिक” मानसिकता के कारण महिला कलाकारों की कैरियर संभावनाएं और निर्णय लेने की आजादी सीमित हो जाती हैं।
स्मिता पाटिल ने कई इंटरव्यू में यह भी कहा कि फिल्म उद्योग में महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की जरूरत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कलाकारों के सुरक्षा और मर्यादा के अधिकार का सम्मान होना चाहिए, ताकि किसी भी महिला को काम के दौरान मानसिक या शारीरिक असुरक्षा का सामना न करना पड़े।
उनकी इस बेबाक सोच का असर उनके फिल्मों के चुनाव पर भी दिखा। स्मिता ने अक्सर ऐसी भूमिकाओं को चुना जो सामाजिक संदेश देती हों और महिलाओं के सशक्तिकरण को दर्शाती हों। उन्होंने केवल ग्लैमर या रोमांस तक सीमित रहने वाले रोल नहीं निभाए। फिल्में जैसे अरथ, भुवन शोम और मंडी में उन्होंने अपने किरदारों के माध्यम से महिलाओं की जमीनी सच्चाई और संघर्ष को पर्दे पर उतारा।
स्मिता पाटिल की आवाज़ उस दौर की महिला कलाकारों के लिए प्रेरणा बन गई। उन्होंने यह साबित किया कि सिर्फ अभिनय करना ही नहीं, बल्कि अपने अधिकार और सम्मान के लिए सवाल उठाना भी जरूरी है। आज भी फिल्म उद्योग में उनके विचारों का महत्व बना हुआ है, और कई युवा अभिनेत्री उनके आदर्श को अपनाकर अपने पेशेवर फैसलों में समानता और सम्मान के लिए खड़ी हैं।
स्मिता पाटिल ने बॉलीवुड में लिंग भेदभाव और कार्यस्थल की असमानता पर जो बहस शुरू की, उसका असर आज भी महसूस किया जा सकता है। उन्होंने सिर्फ अपने करियर के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी इंडस्ट्री में महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के लिए आवाज उठाई।
स्मिता पाटिल के इस बेबाक रवैये ने यह स्पष्ट कर दिया कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश और बदलाव का उपकरण भी हो सकता है। उनका कहना था कि अगर हीरो के लिए मर्यादा और सुरक्षा जरूरी है, तो महिला कलाकारों के लिए यह और भी जरूरी है।
इस दृष्टिकोण ने बॉलीवुड में महिला सशक्तिकरण और नैतिकता पर बहस को जन्म दिया। उनके सवाल और उनके काम ने यह साबित किया कि सिनेमा में महिलाएं सिर्फ रोल निभाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी पहचान और अधिकारों के लिए भी बराबरी की मांग कर सकती हैं।

