Body Shaming: कैटरीना कैफ की तस्वीरों से फिर छिड़ी शरीर पर बहस, जानें क्यों बढ़ रहा है Weight Stigma
बॉलीवुड सितारों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आते ही अक्सर उनके कपड़ों, लुक और फिटनेस को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है। लेकिन कई बार यह चर्चा किसी व्यक्ति के शरीर और वजन पर टिप्पणी तक पहुंच जाती है। हाल में कैटरीना कैफ की गणेश चतुर्थी के दौरान सामने आई तस्वीरों को लेकर भी सोशल मीडिया पर उनके शरीर में बदलावों की तुलना की गई। इससे एक बार फिर यह सवाल उठता है कि आखिर किसी व्यक्ति के शरीर के आकार को लेकर समाज इतना जल्दी फैसला क्यों करने लगता है?
ऐश्वर्या राय बच्चन समेत कई दूसरी अभिनेत्रियां भी समय-समय पर सोशल मीडिया पर अपने लुक और शरीर को लेकर टिप्पणियों का सामना करती रही हैं। इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए सोशल साइंस में Weight Stigma और Fatphobia जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है।
Weight Stigma आखिर क्या है?
किसी व्यक्ति को उसके वजन या शरीर के आकार के आधार पर कमतर समझना, उसका मजाक उड़ाना या उसके बारे में नकारात्मक धारणाएं बनाना Weight Stigma कहलाता है। यह केवल सोशल मीडिया की टिप्पणियों तक सीमित नहीं है। इसका असर परिवार, स्कूल, कार्यस्थल और हेल्थकेयर जैसी जगहों पर भी देखने को मिल सकता है।
शोध में यह भी सामने आया है कि वजन से जुड़े पूर्वाग्रहों का असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। भारत में हुई एक पायलट स्टडी में मेटाबॉलिक और बैरिएट्रिक सर्जरी की सलाह लेने वाले 142 लोगों का अध्ययन किया गया। इसमें 71.1 फीसदी प्रतिभागियों का स्कोर इंटरनलाइज्ड वेट बायस की न्यूट्रल सीमा से ऊपर था।
भारत में अंदर तक पहुंच चुका है बॉडी शेमिंग का असर
इस भारतीय अध्ययन में करीब 74.6 फीसदी प्रतिभागियों ने अपने वजन को लेकर उदासी या डिप्रेशन जैसा महसूस करने की बात कही। आधे से अधिक लोगों ने खुद को अपने वजन के कारण कम आकर्षक महसूस किया, जबकि एक हिस्से ने अपनी क्षमता को लेकर भी नकारात्मक धारणा व्यक्त की। करीब आधे प्रतिभागियों का मानना था कि वजन कम होने तक उन्हें बेहतर सोशल लाइफ का हक नहीं है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि यह अध्ययन सामान्य भारतीय आबादी पर नहीं, बल्कि बैरिएट्रिक सर्जरी के लिए सलाह लेने वाले लोगों पर किया गया था। इसलिए इसके आंकड़ों को पूरे देश की आबादी पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
फिल्मों और कॉमेडी में भी दिखता है असर
फिल्मों में भी शरीर के आकार को लेकर बने सामाजिक नजरिए की झलक मिलती है। 2025 में प्रकाशित एक शोध ने मलयालम सिनेमा की कुछ फिल्मों में मोटे पुरुष किरदारों के चित्रण का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं के अनुसार, कई मामलों में ऐसे किरदारों को हास्य का माध्यम बनाया जाता है, जिससे बॉडी शेमिंग और Fatphobia से जुड़े सामाजिक नजरिए सामान्य लग सकते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि हर फिल्म या हर कॉमेडी बॉडी शेमिंग को बढ़ावा देती है। लेकिन शोध यह सवाल जरूर उठाता है कि किसी व्यक्ति की शारीरिक बनावट को बार-बार मजाक का विषय बनाने से समाज में शरीर को लेकर बनी धारणाएं कैसे मजबूत हो सकती हैं।
ऑफिस में भी वजन को लेकर टिप्पणियों का असर
Weight Stigma का असर कार्यस्थल पर भी देखा गया है। 2026 में प्रकाशित एक भारतीय अध्ययन में दिल्ली-NCR की मल्टीनेशनल कंपनियों के कर्मचारियों के बीच Weight-Based Teasing का अध्ययन किया गया। रिसर्च में पाया गया कि वजन को लेकर की जाने वाली छेड़छाड़ और टिप्पणियां कर्मचारियों में Psychological Distress से सांख्यिकीय रूप से जुड़ी थीं।
यानी किसी सहकर्मी के शरीर या वजन पर की गई टिप्पणी सिर्फ मजाक भर नहीं हो सकती। कुछ लोगों के लिए इसका असर आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य तक पहुंच सकता है।
हेल्थकेयर में Weight Stigma क्यों चिंता की बात है?
वजन को लेकर पूर्वाग्रह हेल्थकेयर में भी चर्चा का विषय रहा है। भारत में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, मोटापे से जूझ रहे मरीजों को हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स की ओर से भी Weight Bias का सामना करना पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने इसे मरीजों की मनोवैज्ञानिक स्थिति और हेल्थकेयर अनुभव से जुड़ा मुद्दा बताया है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ वजन पर टिप्पणी करने के बजाय मरीज की वास्तविक स्वास्थ्य जरूरतों, मेडिकल हिस्ट्री और व्यक्तिगत परिस्थितियों पर ध्यान देने की बात करते हैं।
'Health At Every Size' का क्या मतलब है?
Health At Every Size यानी HAES को अक्सर इसी बहस के संदर्भ में चर्चा में लाया जाता है। इसका मूल विचार यह है कि स्वास्थ्य और सम्मान को केवल शरीर के वजन या आकार से परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए।
इस नजरिए में संतुलित खान-पान, शारीरिक गतिविधि, मानसिक स्वास्थ्य और सम्मानजनक मेडिकल केयर जैसे पहलुओं पर ध्यान देने की बात होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शरीर का वजन स्वास्थ्य के लिए कभी महत्वपूर्ण नहीं होता। बल्कि यह वजन को लेकर कलंक और भेदभाव से अलग स्वास्थ्य पर ध्यान देने की कोशिश है।
जरूरत वजन पर टिप्पणी की नहीं, नजरिया बदलने की है
कैटरीना कैफ जैसी सेलिब्रिटीज की तस्वीरों पर होने वाली सोशल मीडिया बहस इस बड़े सामाजिक मुद्दे का सिर्फ एक हिस्सा है। किसी महिला के गर्भावस्था के बाद शरीर में बदलाव हों या किसी पुरुष के वजन में बदलाव, शरीर का आकार किसी व्यक्ति की पूरी पहचान तय नहीं करता।
National Eating Disorders Association (NEDA) ने भी “Imagine a World Without Weight Hate” नाम से Weight Stigma Awareness अभियान चलाया है। इसका उद्देश्य लोगों को शरीर के आकार के आधार पर होने वाले भेदभाव और उसके मानसिक स्वास्थ्य पर असर के प्रति जागरूक करना है।
आखिरकार सवाल यह नहीं है कि हर व्यक्ति का शरीर कैसा दिखना चाहिए, बल्कि यह है कि क्या हम किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर को उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक चर्चा और मजाक का विषय बनाए बिना भी अपनी बात कह सकते हैं।

