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Loksabha Election 2024 के लिए अपनी पसंद की सीटें छोड़ने को राजी नहीं कांग्रेस, सपा-कांग्रेस गठबंधन में इन सीटों की जिद में बढ़ी तनातनी 
 

उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटों को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच संशय बरकरार है. कांग्रेस अपनी पहली वरीयता की सीटें छोड़ने को तैयार नहीं है, जबकि सपा ने इन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं....
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उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटों को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच संशय बरकरार है. कांग्रेस अपनी पहली वरीयता की सीटें छोड़ने को तैयार नहीं है, जबकि सपा ने इन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. ऐसे में गठबंधन में दरार पड़ती दिख रही है. हालांकि दोनों ही पार्टी के नेता सीटों का मसला जल्द सुलझाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन अंदरुनी हालात कुछ और हैं.कांग्रेस ने राज्य की 80 सीटों को वरीयता के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा है. पहली प्राथमिकता उन सीटों को दी गई है जिन पर 2009 और 2014 में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी. साथ ही पिछले साल नगर निकाय चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाली सीटों को भी वह अपनी प्राथमिकता में शामिल कर रही है. इस प्रकार पहली प्राथमिकता वाली 30 सीटों का दावा किया गया।सीट निर्धारण के लिए बनी कमेटी दो दौर की बातचीत भी कर चुकी है. इससे पहले कांग्रेस और सपा ने हर सीट पर दो-दो उम्मीदवार उतारे थे. सूत्रों का कहना है कि सपा की ओर से कांग्रेस को करीब 20 सीटें दी जा रही हैं, लेकिन उसकी पहली प्राथमिकता वाली सीटों की संख्या पांच से सात ही है. ऐसी अन्य सीटें देने की पहल की गई है, जिनके लिए कांग्रेस के पास न तो जनाधार है और न ही संगठनात्मक तैयारी। ऐसे में कांग्रेस ने ये सीटें लेने से इनकार कर दिया है.

इन सीटों पर हरी झंडी

सूत्रों का कहना है कि सपा की ओर से कांग्रेस को अमेठी, रायबरेली, कानपुर, जालौन, बांसगांव, बरेली, सीतापुर, गाजियाबाद, बुलंदशहर आदि सीटें देने की पहल की गई है, लेकिन कांग्रेस ये सीटें लेने को तैयार नहीं है. . फर्रुखाबाद, लखीमपुर खीरी आदि सीटें कांग्रेस की पहली प्राथमिकता हैं, लेकिन सपा ने इन सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. इसी तरह सपा सहारनपुर सीट नहीं देना चाहती, जबकि कांग्रेस यह सीट छोड़ने को तैयार नहीं है. ऐसे में दोनों पार्टियों के बीच कड़वाहट बढ़ती जा रही है. हालांकि सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है कि जनाधार के आधार पर सीटों पर बातचीत हो रही है, जल्द ही मामला सुलझ जाएगा. वहीं, कांग्रेस प्रवक्ता अंशू अवस्थी का कहना है कि कांग्रेस पहली प्राथमिकता वाली सीटों पर लंबे समय से तैयारी कर रही है. ऐसे में उन्हें छोड़ना भविष्य की राजनीति के लिहाज से अच्छा नहीं होगा. सपा को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो लोग बीजेपी को हराने की ताकत रखते हैं उन्हें ही सीटें दी जाएं.

सपा को अपनी जिद छोड़नी चाहिए

लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रो. राजेंद्र वर्मा का कहना है कि लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को रोकने के लिए सपा, कांग्रेस समेत बाकी सभी विपक्षी दलों को अपने मतभेद भुलाकर एक मंच पर आना चाहिए. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को अपने सभी सहयोगी दलों को एकजुट रखने की जिम्मेदारी उठानी होगी. क्योंकि वह राजनीतिक तौर पर राज्य में बड़े भाई की भूमिका में हैं. हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता महेंद्र मंडल कहते हैं कि एसपी की ओर से सामाजिक न्याय की वकालत की जा रही है, लेकिन पीडीए और सामाजिक न्याय की बात करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य और पल्लवी पटेल दूरी बनाए हुए दिख रहे हैं. लोड पहले ही अलग हो चुका है. ऐसे में सपा को जिद के बजाय उदारता दिखाकर गठबंधन धर्म निभाना चाहिए। संविधान बचाने के लिए बीजेपी को रोकना जरूरी है.

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