पान की दुकान चलाने वाले पिता के बेटे को अमेरिका में 2.6 करोड़ की स्कॉलरशिप, कभी फीस के लिए तरसे नीरज अब करेंगे Phd
बिहार के सारण जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर अमेरिका तक पहुंचने वाले नीरज कुमार सिंह की कहानी संघर्ष, मेहनत और सफलता की मिसाल है। जिस परिवार के लिए कभी पढ़ाई की फीस जुटाना भी मुश्किल था, उसी परिवार का बेटा आज अमेरिका की यूनिवर्सिटी में पूरी तरह वित्तपोषित PhD कर रहा है।
नीरज को अमेरिका की University of Massachusetts Lowell में Educational Leadership के क्षेत्र में PhD के लिए पूरी तरह वित्तपोषित छात्रवृत्ति मिली है। इस छात्रवृत्ति की पूरी अवधि की अनुमानित राशि करीब 2.6 करोड़ रुपये बताई गई है। वर्ष 2026-27 के इस PhD शोधार्थी वर्ग में 60 शोधकर्ता शामिल हैं और नीरज के अनुसार, भारत से चयनित होने वाले वह एकमात्र शोधार्थी हैं।
पिता चलाते थे पान की दुकान, मां रहती थीं बीमार
नीरज बिहार के सारण जिले के पानापुर प्रखंड के सतजोरा गांव के पकड़ी नरोट्टम टोला के रहने वाले हैं। उनके पिता प्रमोद सिंह पान की दुकान चलाते थे, जबकि मां गीता देवी अक्सर बीमार रहती थीं।
परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि मां के इलाज, घर के खर्च और बच्चों की पढ़ाई के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था। तीन भाइयों वाले परिवार में कई बार पढ़ाई की फीस जुटाना भी चुनौती बन जाता था।
नीरज ने बताया कि दसवीं के बाद उनकी पढ़ाई जारी रखने में आसपास के लोगों और शुभचिंतकों ने मदद की। इसी सहयोग की वजह से वह आगे की पढ़ाई जारी रख सके।
2017 में बदली जिंदगी की दिशा
नीरज ने वर्ष 2008 में दसवीं, 2010 में जगदम कॉलेज से इंटरमीडिएट और 2013 में जय प्रकाश विश्वविद्यालय से BSc की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद वर्ष 2017 में उनका जुड़ाव नेहरू युवा केंद्र संगठन, सारण से हुआ। ग्रामीण युवाओं और समुदाय के बीच काम करते हुए उन्हें सामाजिक विकास और युवा नेतृत्व को करीब से समझने का मौका मिला।
यही अनुभव आगे चलकर उनके करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। सामाजिक कार्य के दौरान उन्हें चेन्नई जाने का अवसर मिला और वर्ष 2019 में उन्होंने राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान से Master of Social Work की डिग्री हासिल की।
इसके बाद सामाजिक कार्य उनके लिए सिर्फ नौकरी या अनुभव का क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे यह उनके शोध और करियर का मुख्य विषय बन गया।
गांव से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा काम
नीरज ने शिक्षा, युवा विकास, स्वास्थ्य, आजीविका और सामुदायिक विकास से जुड़ी कई परियोजनाओं पर काम किया है।
कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने झारखंड और ओडिशा में USAID से जुड़ी परियोजना के तहत टीकाकरण कार्यक्रमों में योगदान दिया। तेलंगाना में भी उन्होंने महामारी के दौरान ऑक्सीजन सप्लाई और वैक्सीनेशन से जुड़े कार्यों में सहयोग किया।
इसके अलावा उन्हें IIT धनबाद के साथ शोध और भारतीय विदेश व्यापार संस्थान के साथ वस्त्र क्षेत्र से जुड़े अध्ययनों का अनुभव मिला।
अपने काम के दौरान नीरज को बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया, म्यांमार, कंबोडिया और लाओस जैसे देशों में युवा विकास और सामुदायिक कार्यक्रमों से जुड़ने का अवसर भी मिला।
2,500 से ज्यादा विद्यार्थियों को किया प्रशिक्षित
वर्ष 2023 में नीरज ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई से Diploma in Youth Leadership and Social Change किया।
इसके साथ ही अलग-अलग विश्वविद्यालयों में 2,500 से अधिक विद्यार्थियों के प्रशिक्षण और मार्गदर्शन में भी उन्होंने भूमिका निभाई।
शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में लगातार काम करने के अनुभव ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने का रास्ता दिया। उन्हें अमेरिका की University of Pennsylvania में भी अध्ययन का अवसर मिला।
अब अमेरिका में कर रहे हैं PhD
नीरज अब University of Massachusetts Lowell में Educational Leadership विषय पर PhD कर रहे हैं। उनके शोध की रुचि बहुभाषी शिक्षा, शिक्षा में समानता और समावेशी शिक्षा जैसे क्षेत्रों में है।
उनका शोध इस बात पर केंद्रित है कि भाषा, सामाजिक पृष्ठभूमि या आर्थिक परिस्थितियों की वजह से किसी विद्यार्थी के शिक्षा के अवसर सीमित न हों।
PhD के साथ-साथ नीरज को विश्वविद्यालय में Teaching Assistant की जिम्मेदारी भी मिली है। विश्वविद्यालय की वित्तीय सहायता में ट्यूशन फीस, स्वास्थ्य बीमा और नियमित मासिक स्टाइपेंड शामिल है।
करीब 2.6 करोड़ रुपये की राशि पूरी PhD अवधि में मिलने वाली कुल वित्तीय सहायता का अनुमान है।
अब प्रोफेसर बनने का सपना
जिस परिवार के लिए कभी पढ़ाई की फीस जुटाना बड़ी चुनौती हुआ करती थी, उसी परिवार का बेटा आज अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल कर रहा है।
नीरज का लक्ष्य भविष्य में शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में काम करना और प्रोफेसर बनना है। उनकी कहानी बताती है कि आर्थिक मुश्किलें रास्ते में बड़ी चुनौती जरूर बन सकती हैं, लेकिन लगातार शिक्षा, मेहनत और सही अवसर मिलने पर आगे बढ़ने के रास्ते भी खुल सकते हैं।
बिहार के एक छोटे से गांव से शुरू हुई नीरज की यह यात्रा अब अमेरिका की यूनिवर्सिटी तक पहुंच चुकी है और उनका अगला लक्ष्य शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाना है।

