अमेरिका से भारतीय छात्रों का मोहभंग! UG एडमिशन में 15% गिरावट, अब जर्मनी-कनाडा समेत इन देशों का रुख
अमेरिका में पढ़ाई का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में गिरावट देखने को मिल रही है। 2025-26 सेशन में अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लेने वाले भारतीय छात्रों की संख्या करीब 15% कम हुई है। वहीं, अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आवेदन और नामांकन में भी कमी दर्ज की गई है। सख्त वीजा नियम, इमिग्रेशन पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता और बढ़ती लागत को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है।
अमेरिका में भारतीय छात्रों के आवेदन घटे
1,100 से ज्यादा संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक गैर-लाभकारी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026-27 शैक्षणिक वर्ष में अंडरग्रेजुएट एडमिशन के लिए कुल आवेदन बढ़े हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय आवेदकों की संख्या में 1 मार्च तक 10% की गिरावट दर्ज की गई।भारत से आने वाले आवेदकों की संख्या करीब 15% कम हुई है। अमेरिका में विदेशी छात्रों के सबसे बड़े स्रोतों में भारत शामिल है, इसलिए इस गिरावट का असर अमेरिकी विश्वविद्यालयों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
अमेरिका को विदेशी छात्रों से अरबों डॉलर का फायदा
2024-25 शैक्षणिक वर्ष में भारत से 3.63 लाख से ज्यादा छात्रों ने अमेरिका में अलग-अलग पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया था। अंतरराष्ट्रीय छात्रों ने अमेरिकी स्थानीय अर्थव्यवस्था में करीब 41.77 अरब डॉलर का योगदान दिया था।हालांकि, 2026-27 में यह योगदान घटकर करीब 38.37 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया है। इससे पता चलता है कि विदेशी छात्रों की संख्या में गिरावट का असर सिर्फ विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है।
क्यों अमेरिका से दूरी बना रहे भारतीय छात्र?
1. वीजा और इमिग्रेशन नियमों को लेकर चिंता
अमेरिका में छात्र वीजा और इमिग्रेशन नीतियों को लेकर सख्ती बढ़ने से छात्रों और उनके परिवारों में अनिश्चितता बढ़ी है। पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने और लंबे समय तक रहने के विकल्पों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
2. वीजा अवधि में बदलाव की चिंता
रहने की अवधि और वीजा नियमों में संभावित बदलाव लंबे समय के कोर्स करने वाले छात्रों के लिए चिंता का विषय हैं। छात्रों को डर है कि पढ़ाई पूरी करने और उसके बाद करियर बनाने की योजना पहले की तुलना में ज्यादा जटिल हो सकती है।
3. पढ़ाई का बढ़ता खर्च
अमेरिका में ट्यूशन फीस, रहने का खर्च और हेल्थ इंश्योरेंस जैसी लागत पहले से ही काफी ज्यादा है। इसके अलावा विदेशी छात्रों और पढ़ाई के बाद काम करने की योजनाओं से जुड़े संभावित शुल्क भी छात्रों के फैसले को प्रभावित कर रहे हैं।
यूरोप बन रहा भारतीय छात्रों का नया ठिकाना
अमेरिका में बढ़ती अनिश्चितता के बीच यूरोपीय देशों में भारतीय छात्रों की दिलचस्पी बढ़ रही है। कम ट्यूशन फीस, अपेक्षाकृत आसान वीजा विकल्प और पढ़ाई के बाद काम के अवसर यूरोप को आकर्षक बना रहे हैं।
फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, आयरलैंड, इटली और पुर्तगाल जैसे देश भारतीय छात्रों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। यूरोप में भारतीय छात्रों की संख्या 1.21 लाख से ज्यादा होने की बात सामने आई है।
जर्मनी: कम फीस बड़ा फायदा
जर्मनी भारतीय छात्रों के लिए तेजी से लोकप्रिय विकल्प बन रहा है। यहां कई सरकारी विश्वविद्यालयों में ट्यूशन फीस काफी कम है या कुछ पाठ्यक्रमों में नहीं होती। पढ़ाई के साथ काम करने के अवसर भी मिलते हैं।
चुनौती: कई नौकरियों और रोजमर्रा के काम के लिए जर्मन भाषा का ज्ञान जरूरी हो सकता है।
कनाडा: पढ़ाई और करियर के विकल्प
कनाडा में भारतीय छात्रों की लंबे समय से मजबूत मौजूदगी रही है। अच्छी यूनिवर्सिटीज, बहुसांस्कृतिक माहौल और पढ़ाई के साथ काम करने के विकल्प इसे आकर्षक बनाते हैं।
चुनौती: कई शहरों में किराया और रहने का खर्च काफी बढ़ गया है। इसके साथ ही इमिग्रेशन और स्टूडेंट वीजा नियमों में भी सख्ती आई है।
ऑस्ट्रेलिया: अच्छी शिक्षा, लेकिन महंगा विकल्प
ऑस्ट्रेलिया की कई यूनिवर्सिटीज अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में मजबूत स्थिति रखती हैं। यहां पढ़ाई में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर भी जोर दिया जाता है और योग्य छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद काम के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं।
चुनौती: ट्यूशन फीस और रहने का खर्च काफी ज्यादा हो सकता है, खासकर सिडनी और मेलबर्न जैसे बड़े शहरों में।
बदल रही है भारतीय छात्रों की पसंद
अमेरिका लंबे समय से भारतीय छात्रों के लिए सबसे पसंदीदा विदेशी शिक्षा गंतव्यों में रहा है। लेकिन वीजा नियमों में बदलाव, बढ़ती फीस और पढ़ाई के बाद नौकरी की अनिश्चितता के कारण छात्र अब दूसरे देशों को भी गंभीरता से देख रहे हैं।ऐसे में जर्मनी, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के दूसरे देश भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका के विकल्प के रूप में तेजी से उभर रहे हैं। आने वाले वर्षों में अगर अमेरिकी वीजा और इमिग्रेशन नीतियों में अनिश्चितता बनी रहती है, तो विदेश में पढ़ाई की भारतीय छात्रों की पसंद में और बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

