Haryana Girls Education: घरेलू जिम्मेदारियों के कारण पढ़ाई छोड़ रही हैं बेटियां, राष्ट्रीय औसत से 19.9 प्रतिशत अंक ज्यादा
हरियाणा में घरेलू जिम्मेदारियां बेटियों की शिक्षा और करियर के रास्ते में बड़ी बाधा बन रही हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 15 से 21 वर्ष की आयु वर्ग की पढ़ाई छोड़ चुकी 61.5 प्रतिशत लड़कियों ने घरेलू कामकाज को इसकी प्रमुख वजह बताया है। राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 41.6 प्रतिशत है। यानी हरियाणा में यह हिस्सेदारी राष्ट्रीय औसत से 19.9 प्रतिशत अंक अधिक है।
इसके विपरीत, इसी आयु वर्ग के 55.1 प्रतिशत लड़कों ने पढ़ाई छोड़ने के पीछे आर्थिक तंगी को प्रमुख कारण बताया। ये आंकड़े बताते हैं कि लड़कियों की शिक्षा जारी रखने के लिए केवल स्कूल-कॉलेज में दाखिला दिलाना ही पर्याप्त नहीं है। परिवार में घरेलू जिम्मेदारियों का समान बंटवारा और पढ़ाई के लिए अनुकूल माहौल बनाना भी जरूरी है।
NEET श्रेणी में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा
रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा में 15 से 29 वर्ष की 49.9 प्रतिशत महिलाएं NEET श्रेणी में आती हैं। NEET का अर्थ है ऐसे युवा, जो न तो शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, न रोजगार में हैं और न ही किसी प्रशिक्षण से जुड़े हैं। पुरुषों में यह आंकड़ा केवल 8.7 प्रतिशत है। इस तरह दोनों के बीच 41.2 प्रतिशत अंकों का अंतर है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस श्रेणी में शामिल 94.1 प्रतिशत महिलाओं ने घरेलू जिम्मेदारियों को इसकी वजह माना, जबकि केवल 2.9 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि वे रोजगार की तलाश कर रही हैं। इससे पता चलता है कि घर और परिवार की जिम्मेदारियां महिलाओं की शिक्षा, कौशल विकास और नौकरी के अवसरों को प्रभावित कर रही हैं।
राजनीति में भी महिलाओं की भागीदारी सीमित
महिलाओं की चुनौतियां केवल शिक्षा और रोजगार तक सीमित नहीं हैं। सार्वजनिक जीवन और फैसले लेने वाली संस्थाओं में भी उनकी भागीदारी कम दिखाई देती है। हरियाणा की 90 सदस्यीय विधानसभा में 13 महिला विधायक हैं, जो कुल सदस्यों का लगभग 14.4 प्रतिशत है। वहीं, राज्य के 10 लोकसभा सांसदों में केवल एक महिला सांसद है। यह हिस्सेदारी 10 प्रतिशत है।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के साथ-साथ राजनीति और सार्वजनिक नीतियों में उनकी भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी प्रयास करने की जरूरत है।
योजनाओं के साथ सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी
बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन सामाजिक सोच में बदलाव अब भी एक बड़ी चुनौती है। कई परिवारों में लड़कियों से घरेलू कामकाज की अपेक्षा अधिक की जाती है, जबकि लड़कों की पढ़ाई और करियर को प्राथमिकता दी जाती है। इसका असर लड़कियों की नियमित पढ़ाई, उच्च शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति को बदलने के लिए परिवारों में जिम्मेदारियों का समान बंटवारा, लड़कियों को आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहन और रोजगार से जुड़े कौशल सीखने के अवसर जरूरी हैं। बेटियों को केवल शादी तक शिक्षा देने के बजाय अपनी पसंद का करियर चुनने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
रिपोर्ट के आंकड़े इस बात पर ध्यान दिलाते हैं कि लड़कियों की शिक्षा और रोजगार में भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकारी योजनाओं के साथ परिवार और समाज की भूमिका भी अहम है।

