हम अक्सर अपनी परेशानियों को ही सबसे बड़ा दुख मान लेते हैं। नौकरी का तनाव, पैसों की चिंता, रिश्तों की उलझनें—सब हमें भारी लगती हैं। लेकिन जब हम ज़रा सा बाहर झांकते हैं, तो एहसास होता है कि दुनिया में ऐसे अनगिनत लोग हैं, जिनके सामने हमारी मुश्किलें बहुत छोटी लगने लगती हैं।
कोई रोज़ भूखा सोता है, कोई अपनों के बिना ज़िंदगी काट रहा है, कोई बीमारी से जूझ रहा है तो कोई अन्याय और अत्याचार सह रहा है। सड़क किनारे मेहनत करता मजदूर, अकेलेपन से लड़ता बुज़ुर्ग, या अपनी मासूमियत खोता बच्चा—हर किसी की अपनी लड़ाई है।
इसका मतलब यह नहीं कि आपका दर्द मायने नहीं रखता। आपका दुख भी सच है। लेकिन जब हम दूसरों के संघर्ष को देखते हैं, तो हमें अपने जीवन के लिए आभार महसूस होना चाहिए। शायद यही सोच हमें मजबूत बनाती है, शिकायत से बाहर निकालती है और सहनशील बनाती है।
यह सवाल हमें खुद से पूछने के लिए मजबूर करता है— क्या हम अपनी तकलीफों में इतने उलझ गए हैं कि दूसरों का दर्द देख ही नहीं पा रहे? क्या हम आभारी होना भूल गए हैं?
शायद ज़िंदगी कठिन है, लेकिन हर किसी के लिए अलग‑अलग तरह से। और जब हम यह समझ लेते हैं, तभी इंसानियत, संवेदना और सच्ची मजबूती जन्म लेती है।

