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बेटी की बेशर्मी: वृद्ध मां को आश्रम छोड़ने निकली, बोली—“अब घर में जगह नही है”, Video

बेटी की बेशर्मी: वृद्ध मां को आश्रम छोड़ने निकली, बोली—“अब घर में जगह नही है”, Video

एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने लोगों के दिलों को झकझोर दिया है। वृद्ध महिला को उसकी ही बेटी ने वृद्ध आश्रम छोड़ने के लिए मजबूर किया, यह कहते हुए कि अब घर में जगह बनाने की जरूरत है। यह घटना परिवार और समाज में बुजुर्गों के प्रति बढ़ती उदासीनता और असंवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, वृद्ध महिला लंबे समय से अपनी बेटी के घर रह रही थी। उम्र और स्वास्थ्य की वजह से उसकी देखभाल आवश्यक थी। लेकिन हाल ही में बेटी ने वृद्धा को वृद्ध आश्रम ले जाने की योजना बनाई और इस दौरान उसने अपनी मां से कहा, “अब घर में जगह बनाना जरूरी है, तुम आश्रम चली जाओ।”

वृद्धा के पड़ोसियों और आश्रम के कर्मचारियों ने बताया कि महिला अपने परिवार से अत्यधिक निराश और अकेली महसूस कर रही थी। वृद्धा ने आश्रम जाने पर भी दुख जताया और कहा कि उसे कभी उम्मीद नहीं थी कि उसकी अपनी बेटी ही उसे अकेला कर देगी।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह घटना केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह समाज में बुजुर्गों के अधिकारों और उनके सम्मान की अनदेखी की व्यापक तस्वीर पेश करती है। बढ़ती जीवनशैली, व्यस्त दिनचर्या और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ के कारण कई बार बुजुर्गों को उपेक्षित किया जाता है।

वृद्धा के मामले ने प्रशासन और समाजिक संगठनों की भी चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय NGO ने वृद्धा का आश्रम में स्वागत किया और उसके स्वास्थ्य, भोजन और देखभाल की व्यवस्था की। साथ ही उन्होंने परिवार को समझाने की कोशिश की कि बुजुर्गों का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बुजुर्गों को आश्रम भेजने का निर्णय कभी भी उनकी इच्छा और सम्मान के खिलाफ नहीं होना चाहिए। बच्चों का कर्तव्य है कि वे अपने माता-पिता के जीवन के अंतिम चरण में उनका ख्याल रखें और उन्हें अकेला न छोड़ें।

स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर इस घटना ने व्यापक चर्चा शुरू कर दी है। लोग बेटी की बेरहमी और बुजुर्गों के प्रति समाज की संवेदनहीनता पर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। कई लोग कह रहे हैं कि यह घटना हमें याद दिलाती है कि परिवार और समाज दोनों में बुजुर्गों का सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है।

इस घटना ने यह संदेश भी दिया कि बुजुर्ग किसी भी परिवार और समाज का अभिन्न हिस्सा होते हैं। उनकी उपेक्षा केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना की कमी का प्रतीक भी है।

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