रंगों के उत्सव होली में जहां देशभर में लोग गुलाल और अबीर से सराबोर नजर आते हैं, वहीं मेवाड़ क्षेत्र में एक ऐसी अनूठी परंपरा निभाई जाती है, जो पूरे प्रदेश में अलग पहचान रखती है। उदयपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर चित्तौड़गढ़ हाईवे पर स्थित मेनार गांव में रंगों के साथ ‘बारूद की होली’ खेली जाती है। यह अनोखा आयोजन होली के तीसरे दिन, चैत्र कृष्ण द्वितीया को किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘जमरा बीज’ कहा जाता है।
इस वर्ष यह परंपरागत होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। इस दिन मेनार गांव देर रात तक बंदूकों की गर्जना और तोपों की गूंज से थर्रा उठता है। चारों ओर बारूद की आवाजें गूंजती हैं और पूरा वातावरण ऐतिहासिक युद्धभूमि जैसा प्रतीत होता है।
युद्ध परंपरा की याद
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह परंपरा लगभग 500 साल पुरानी है। कहा जाता है कि मेनार के वीरों ने ऐतिहासिक युद्धों में अपनी बहादुरी का परिचय दिया था। उसी शौर्य और वीरता की स्मृति में ‘बारूद की होली’ खेली जाती है। यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि पराक्रम और गौरव का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन गांव के लोग पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर निकलते हैं। पहले विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है, इसके बाद बंदूकों से हवाई फायर किए जाते हैं। गांव में स्थित चौक और मुख्य स्थलों पर तोपों की गर्जना के साथ यह अनोखा उत्सव चरम पर पहुंचता है।
प्रशासन की निगरानी में आयोजन
बारूद और हथियारों के उपयोग को देखते हुए प्रशासन की ओर से विशेष सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद रहते हैं ताकि आयोजन शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से संपन्न हो सके। हथियारों के उपयोग के लिए निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाता है।
देखने उमड़ती है भीड़
मेनार की ‘बारूद की होली’ को देखने के लिए आसपास के जिलों सहित दूर-दराज से भी लोग पहुंचते हैं। पर्यटक और फोटोग्राफर इस अनोखी परंपरा को अपने कैमरों में कैद करते हैं। सोशल मीडिया पर भी इस आयोजन के वीडियो और तस्वीरें हर साल चर्चा का विषय बनते हैं।
जहां एक ओर होली प्रेम और भाईचारे का संदेश देती है, वहीं मेनार की यह परंपरा शौर्य, साहस और ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाती है। मेवाड़ की धरती पर 500 वर्षों से निभाई जा रही ‘बारूद की होली’ आज भी उसी जोश और परंपरा के साथ मनाई जाती है, जो इसे देशभर में विशिष्ट बनाती है।

