रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बढ़ा बाघों का दबाव, वीडियो में देंखे टेरिटरी संघर्ष में 9 साल में 9 बाघों की मौत
राजस्थान के प्रसिद्ध रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या अब एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि यहां बाघों के लिए उपलब्ध क्षेत्र “कम पड़ता” नजर आ रहा है, जिसके चलते टेरिटरी (इलाके) को लेकर संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।जानकारी के अनुसार, अपनी-अपनी सल्तनत स्थापित करने की होड़ में बाघों के बीच आपसी हिंसक झड़पें बढ़ गई हैं। पिछले 9 वर्षों में इस तरह के संघर्षों में 9 बाघों की जान जा चुकी है, जिससे वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञों की चिंता और गहरी हो गई है।
🐅 क्षमता से अधिक बाघ, बढ़ता दबाव
नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) ने भी इस स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। वहीं वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार, रणथंभौर का क्षेत्रफल और घास के मैदान (ग्रासलैंड) अधिकतम 45 से 55 बाघों के लिए ही उपयुक्त हैं।लेकिन वर्तमान में इस टाइगर रिजर्व में करीब 77 बाघ, बाघिन और शावक मौजूद हैं। संख्या में यह बढ़ोतरी अब जंगल की पारिस्थितिकी पर दबाव डाल रही है।
🌿 सीमित क्षेत्र, बढ़ते संघर्ष
जैसे-जैसे बाघों की संख्या बढ़ रही है, जंगल का उपलब्ध क्षेत्र उनके लिए छोटा पड़ता जा रहा है। इसके चलते बाघों के बीच टेरिटरी को लेकर टकराव आम हो गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ एक स्वाभाविक रूप से टेरिटोरियल प्राणी है और हर बाघ अपना अलग क्षेत्र चाहता है।जब जगह सीमित हो जाती है, तो यह संघर्ष हिंसक रूप ले लेता है, जिसका परिणाम जानलेवा झड़पों के रूप में सामने आता है।
⚠️ संरक्षण और प्रबंधन की चुनौती
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति बाघ संरक्षण की सफलता और प्रबंधन की चुनौती दोनों को दर्शाती है। एक ओर बाघों की संख्या बढ़ना संरक्षण की सफलता मानी जा सकती है, लेकिन दूसरी ओर सीमित क्षेत्र में अधिक संख्या होने से पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है।अब आवश्यकता इस बात की है कि बाघों के लिए नए सुरक्षित क्षेत्र विकसित किए जाएं या फिर मौजूदा रिजर्व का वैज्ञानिक तरीके से विस्तार और प्रबंधन किया जाए। फिलहाल रणथंभौर में बढ़ते बाघ संघर्ष ने वन्यजीव संरक्षण नीति और प्रबंधन रणनीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका समाधान समय रहते करना जरूरी माना जा रहा है।

