Ranchi आदिवासियों के अस्तित्व की रक्षा गंभीर सवाल,झारखंड में 38 से घटकर 26 रह गए आदिवासी
झारखण्ड न्यूज़ डेस्क, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में सीएम सोरेन ने कहा है कि प्रकृति पर आधारित आदिवासियों के पारंपरिक धार्मिक अस्तित्व के रक्षा की चिंता निश्चित तौर पर एक गंभीर सवाल है. वर्तमान में जब समान नागरिक संहिता की मांग कतिपय संगठनों ने उठाई है.
आदिवासी-सरना समुदाय की इस मांग पर सकारात्मक पहल उनके संरक्षण के लिए बहुत जरूरी है. आदिवासी समुदाय में भी कई ऐसे समुह हैं जो विलुप्ति के कगार पर हैं और सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर इनका संरक्षण नहीं किया गया तो इनकी भाषा, संस्कृति के साथ-साथ इनका अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा.
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1951 की जनगणना के कॉलम में इनके लिए अलग कोड की व्यवस्था थी, लेकिन कुछ कारणों से बाद के दशकों में यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई. आदिवासी / सरना धर्म कोड की मांग पूरी करना प्रकृति के उपासक आदिवासी समुदाय को अपनी पहचान के प्रति आश्वस्त रहने के लिए भी बहुत जरूरी है.
पूरे विश्व में प्रकृति प्रेम का संदेश फैलेगा
सीएम सोरेन ने पीएम मोदी से कहा है कि उन्हें आदिवासी होने पर गर्व है. उन्होंने एक आदिवासी मुख्यमंत्री होने के नाते झारखंड के साथ पूरे देश के आदिवासियों के हित में आदिवासी / सरना धर्म कोड की चिरप्रतीक्षित मांग पर जल्द सकारात्मक निर्णय लेने का आग्रह पीएम मोदी से किया है. पूरा विश्व बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरण की रक्षा को लेकर चिंतित है. ऐसे समय में प्रकृति एवं पर्यावरण की रक्षा करने वाले धर्म को को मान्यता मिलने से भारत ही नहीं पूरे विश्व में प्रकृति प्रेम का संदेश फैलेगा.
मुख्यमंत्री ने बताया है कि विगत आठ दशकों में झारखंड के आदिवासियों की जनसंख्या के क्रमिक विश्लेषण से ज्ञात होता है कि इनकी जनसंख्या का प्रतिशत झारखंड में 38 से घटकर 26 प्रतिशत ही रह गया है. इनकी जनसख्या के प्रतिशत में इस तरह लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है जिसके फलस्वरुप संविधान की पांचवी एवं छठी अनुसूची के अंतर्गत आदिवासी विकास की नीतियों में प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है.
राँची न्यूज़ डेस्क !!!

