बिहार न्यूज़ डेस्क राजेंद्रनगर स्थित आंख के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को कृपा दृष्टि की जरूरत पड़ गई है. संसाधनों और उपकरणों की कमी झेल रहे इस अस्पताल में मरीजों को साधारण सुविधा भी मुश्किल से मिल पा रही है. छह तल्ले इस अस्पताल में 106 बेड हैं. सभी सेंट्रली एयरकंडिशंड सुविधा से लैस हैं. लेकिन एक भी मरीज की भर्ती नहीं हो पाती है. जिन मरीजों का ऑपरेशन होता है, उन्हें उसी दिन अस्पताल से घर जाने को मजबूर किया जाता है.
चिकित्सकों, नर्सिंग व पारा मेडिकल स्टाफ और उपकरणों की कमी के कारण मोतियाबिंद आंखों का कोई बड़ा ऑपरेशन यहां नहीं हो पाता है. स्टाफ की कमी के कारण आयुष्मान भारत योजना भी यहां बेपटरी हो गई है. चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ, पारा मेडिकल कर्मी, फार्मासिस्ट, ओटी सहायक आदि के रिक्त पदों को भरने और उपकरणों के लिए अस्पताल प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य विभाग और बीएमएसआईसीएल को कई बार पत्र लिखा गया. लेकिन ना तो समुचित संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों की नियुक्ति हुई और ना ही अत्याधुनिक उपकरणों की आपूर्ति की गई.
अस्पताल के प्रभारी निदेशक डॉ. अजीत कुमार द्विवेदी ने बताया कि 2013 से पहले यह 30 बेड का अस्पताल था. 2013 में इसे बढ़ाकर 106 बेड के सुपर स्पेशियलिटी नेत्र अस्पताल में तब्दील कर दिया गया. छह मंजिले नए भवन को भी तैयार किया गया. सीएम नीतीश कुमार का यह ड्रीम प्रोजेक्ट था. 30 बेड से 106 बेड का होने के बावजूद चिकित्सकों, कर्मियों की संख्या नहीं बढ़ाई गई. वह अभी भी 30 बेड के बराबर हैं.
उपकरणों की कमी के कारण बाहर जांच कराने पर हजारों रुपये होते हैं खर्च राजेंद्रनगर सुपर स्पेशियलिटी नेत्र अस्पताल में एनेस्थिसिया से संबंधित उपकरण, स्पेक्टूलर माइक्रोस्कोप, ओसीटी एंजियोग्राफी, विक्टो रेटिना मशीन नहीं हैं. इनसे संबंधित जांच कराने पर मरीज को लगभग तीन से चार हजार रुपये खर्च हो जाते हैं. अस्पताल के ओपीडी में प्रतिदन 250 से 300 मरीज आते हैं. पिछले साल ओपीडी में 66 हजार और इस वर्ष नवंबर तक 45 हजार मरीज अपना इलाज करा चुके हैं. एक साल में लगभग तीन हजार मरीजों की मोतियाबिंद की सर्जरी हुई है.
पटना अथवा राज्य के किसी भी सरकारी अस्पताल से यह संख्या अधिक है. यहां आनेवाले अधिकांश मरीज गरीब या औसत आय वाले होते हैं. बावजूद यहां जरूरी जांच व दवाई की सुविधा नहीं मिल पाती है.
पटना न्यूज़ डेस्क

