करौली की फायर ब्रिगेड बेकार, आठ में से पांच फायर गाड़ियां कबाड़; 3 में पानी टैंक लीक
राजस्थान के करौली में फायर फाइटिंग सिस्टम इन दिनों बहुत खराब हालत में है। नगर परिषद की लापरवाही के कारण कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। शहर की बढ़ती सेंसिटिविटी को देखते हुए यह स्थिति और भी चिंताजनक है। करोड़ों रुपये की फायर फाइटिंग गाड़ियां कबाड़ बन गई हैं, जबकि थोड़ी सी सावधानी से उन्हें चलाया जा सकता था। शहरवासी अब भगवान भरोसे जी रहे हैं।
सिर्फ तीन गाड़ियां चालू हालत में, वह भी असुरक्षित
नगर परिषद के पास कुल आठ फायर गाड़ियां हैं, लेकिन सिर्फ तीन ही चालू हैं। इनमें से एक गाड़ी का पानी का टैंक लीक हो रहा है, जिससे उसकी फायर फाइटिंग क्षमता कमजोर हो रही है। कागजों पर भले ही तीन गाड़ियां दिख रही हों, लेकिन शहर की सुरक्षा भगवान भरोसे है। बाकी पांच गाड़ियां सालों से बंद हैं और उनकी मरम्मत नहीं हुई है।
कमिश्नर का बयान: नीलामी और नई डिमांड की तैयारी
कार्यवाहक कमिश्नर प्रेमराज मीणा ने कहा कि आठ में से तीन गाड़ियां चालू हैं। दो महुआ गैराज में रखी हैं। खराब गाड़ियों की नीलामी का प्रोसेस शुरू होगा, और शहर में इस्तेमाल के लिए छोटी गाड़ियों की रिक्वेस्ट की जाएगी।
सालों से बेकार पड़ी गाड़ियां कबाड़ बन गई हैं।
पांच फायर गाड़ियां इतनी खराब हालत में हैं कि अब इस्तेमाल के लायक नहीं हैं। दो 2020 से बंद हैं। इनमें से एक गाड़ी का पंप खराब है और वह फायर स्टेशन पर खड़ी है। दो और गाड़ियां महुआ के गैराज में बेकार पड़ी हैं, जो बिल्कुल भी अवेलेबल नहीं हैं।
इसके अलावा, एक छोटी गाड़ी 2024 से बंद है। 14,500 लीटर कैपेसिटी वाली एक बड़ी गाड़ी अक्टूबर 2024 से बैटरी और टायर की कमी के कारण बेकार पड़ी है। नगर परिषद की इस लापरवाही से शहर खतरे में है।
आग बुझाने के लिए सिलेंडर पर निर्भरता बढ़ी
शहर में आग पर काबू पाने के लिए अब सिर्फ फायर सिलेंडर का इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर घनी आबादी वाले मार्केट या किसी बड़े कमर्शियल एरिया में बड़ी आग लग जाती है, तो मौजूदा रिसोर्स से उस पर काबू पाना मुश्किल होगा। यह स्थिति करौली जैसे पुराने और घनी आबादी वाले शहर में एक भयानक आपदा को न्योता दे रही है।
नगर परिषद 2022 की हिंसा से सबक भूल गई है। 2022 की करौली हिंसा में आगजनी की कई घटनाएं हुईं। फायर डिपार्टमेंट की कमियां सामने आईं, लेकिन कोई सुधार नहीं किया गया। गाड़ियों की मरम्मत नहीं हुई, न ही नए संसाधन जोड़े गए। शहर की बढ़ती संवेदनशीलता के बावजूद लापरवाही जारी है।

