राजस्थान हाईकोर्ट के 8 जजों को एपीओ, वीडियो में देंखे प्रशासनिक कारणों का हवाला
राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने आठ जजों को एपीओ (असाइनमेंट पोस्ट ऑर्डर) कर दिया है। इस फैसले के कुछ समय पहले कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने अधीनस्थ न्यायालयों का औचक निरीक्षण किया था। इसके बाद हाईकोर्ट रजिस्ट्रार की ओर से एपीओ आदेश जारी किया गया, जिसमें प्रशासनिक कारणों को हवाला दिया गया है।
सूत्रों के अनुसार, जिन जजों को एपीओ किया गया है, उनमें से कुछ कोर्ट टाइम होते हुए भी अपने चैंबर में फैसले लिखवा रहे थे। यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि सभी जजों के लिए कोर्ट टाइम और चैंबर टाइम पहले से निर्धारित होता है। न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार, कोर्ट टाइम में जजों को सुनवाई और न्यायिक कार्यों पर ध्यान देना होता है, जबकि चैंबर टाइम में वे निजी कार्य या आदेश लिखवाने जैसी गतिविधियाँ कर सकते हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट के एपीओ आदेश में किसी भी जज के खिलाफ विशिष्ट कारणों का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है। केवल सामान्य रूप से प्रशासनिक कारणों का हवाला दिया गया है। इससे जुड़े कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम अधिकारियों और न्यायालय की कार्यप्रणाली को सुचारू बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया हो सकता है।
जजों के एपीओ किए जाने की खबर ने न्यायिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना दिया है। कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि यह कदम कोर्ट में पारदर्शिता और अनुशासन बनाए रखने की दिशा में लिया गया हो सकता है। वहीं, कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि जज अपने निर्धारित कोर्ट टाइम का पालन नहीं कर रहे थे, तो प्रशासनिक कदम उठाना संगत और आवश्यक था।
हाईकोर्ट सूत्रों के अनुसार, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का औचक निरीक्षण नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका उद्देश्य है कि अधीनस्थ न्यायालयों में कार्य प्रणाली, सुनवाई और आदेश निष्पादन सही ढंग से हो रहे हैं या नहीं। निरीक्षण के बाद ही प्रशासन ने एपीओ आदेश जारी किया।
कानूनी विशेषज्ञों ने इस कदम को न्यायिक प्रशासन में सख्ती और जवाबदेही का उदाहरण बताया है। उनका कहना है कि जजों की कार्यशैली और कोर्ट टाइम का सही उपयोग सुनिश्चित करना न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि, आदेश में किसी जज का नाम या कार्रवाई का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है, जिससे अदालत और जनता के बीच स्पष्ट कारणों की प्रतीक्षा बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक कदम उठाने के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया और पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है।
कुल मिलाकर, राजस्थान हाईकोर्ट का यह कदम न्यायिक अनुशासन और प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करने की दिशा में माना जा रहा है। इससे यह संदेश भी गया कि कोर्ट टाइम और चैंबर टाइम का पालन सभी जजों के लिए अनिवार्य है और किसी भी प्रकार की अनियमितता को प्रशासनिक रूप से नियंत्रित किया जाएगा।

