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‘पाकिस्तानी आगे-आगे और पीछे हम… राजस्थान के जांबाज़ों ने बताया 1971 की जंग का सच, यहां विस्तार से पढ़े अनकही गाथा 

‘पाकिस्तानी आगे-आगे और पीछे हम… राजस्थान के जांबाज़ों ने बताया 1971 की जंग का सच, यहां विस्तार से पढ़े अनकही गाथा 

भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा हालात बेहद खराब स्थिति में पहुंच चुके हैं। सीमा पर युद्ध जैसे हालात हैं। भारत की ओर से ऑपरेशन सिंधूल शुरू किए जाने के बाद पाकिस्तान लगातार सीमा क्षेत्र में गोलीबारी कर रहा है। इस बीच राजस्थान के वीर जवानों ने बताया कि उन्होंने पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 के युद्ध कैसे लड़े। पाकिस्तान के साथ युद्ध की बात आते ही राजस्थान के सेवानिवृत्त जवानों की भुजाएं 8 दशक बाद भी फड़कने लगती हैं। हाथ तुरंत मूंछों पर ताव देने लगते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव के दौरान पत्रिका ने ऐसे कई सेवानिवृत्त जवानों से बात की है।

1971 के युद्ध में जनता ने दिया था पूरा साथ
1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान जहां जवान सीमा पर दुश्मनों से लोहा ले रहे थे, वहीं देश के आम नागरिक भी अनुशासन और दृढ़ संकल्प के साथ युद्ध प्रयासों में अपना योगदान दे रहे थे। उस दौर में संचार के सीमित साधनों के बावजूद पूरे देश में एकता और देशभक्ति की भावना चरम पर थी। पचलंगी और आसपास के गांवों के लोगों ने उस दौर की यादें साझा कीं और बताया कि कैसे हर नागरिक खुद को इस युद्ध का सिपाही मान रहा था।

50 किलोमीटर अंदर घुसकर किया था गाजीपुर के जंगल पर कब्जा
रिटायर्ड कैप्टन खुशाल सिंह इंदा की यूनिट ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान में 50 किलोमीटर अंदर घुसकर 16 दिसंबर 1971 को गाजीपुर के जंगल पर कब्जा कर लिया था। सिर पर हवाई हमला होने के बावजूद उन्होंने घायल अवस्था में यूनिट के आगे टैंक चलाते हुए तिरंगा लहराया था। आज भी जब भारत-पाक युद्ध की बात आती है तो इंदा की भुजाएं युद्ध के लिए फड़कने लगती हैं। 1971 में पाकिस्तान ने पहली बार जम्मू कश्मीर एयरपोर्ट पर हमला किया था। 5 दिसंबर को उनकी यूनिट को पाकिस्तान के रामदरामदी गांव पर कब्जा करने का टास्क दिया गया था। तब उनकी यूनिट ने रास्ते में लगी बारूदी सुरंगों को हटाकर रात में पाकिस्तान के रामदरामदी गांव पर कब्जा कर लिया था।

पाकिस्तान पर भरोसा करना मतलब धोखा खाना
शहर निवासी 83 वर्षीय हेम सिंह राजपूत ने 1962 में चीन के साथ भारत-पाकिस्तान युद्ध लड़ा, फिर 1965 और 1971 में भी लड़े। हेम सिंह ने बताया कि वे थर्ड राजरीप में तैनात थे और 1965 के युद्ध में उन्होंने पुंछ, राजौरी, 07 चौकियां जाकर पाकिस्तान से युद्ध लड़ा था।1971 में उन्होंने कमांडिंग ऑफिसर भवानी सिंह के नेतृत्व में बाड़मेर में युद्ध लड़ा और पाकिस्तान के छाछरो इलाके पर कब्जा किया था। उन्होंने बताया कि भवानी सिंह के नेतृत्व में उन्होंने बहादुरी से युद्ध लड़ा और पाकिस्तानी सेना आगे-आगे भाग रही थी और हम उनके पीछे थे। ऑपरेशन सिंदूर के बारे में हेम सिंह ने बताया कि पाकिस्तान पर भरोसा करना मतलब धोखा खाना है।

हमने रात को घरों में चूल्हा या चिमनी नहीं जलाई
पापड़ा निवासी सुरजी देवी ने बताया कि 1971 के युद्ध में उनके पति हनुमान पायल ने युद्ध की कमान संभाली थी। उस समय गांवों में संचार का एकमात्र साधन रेडियो था। वह भी सभी के घरों में नहीं था। सरकार ने रात में चूल्हा या चिमनी न जलाने का निर्देश दिया था। पति युद्ध लड़ने के लिए मोर्चे पर था। वहीं घर में रहकर देश को युद्ध जिताने का भी काफी उत्साह था।

चौपालों पर लोग नहीं जुटे
काटलीपुरा निवासी बद्री प्रसाद सैनी ने बताया कि 1971 का युद्ध आमने-सामने की लड़ाई थी। युद्ध जीतने का लक्ष्य देश के हर व्यक्ति के मन में था। योद्धा मोर्चा संभाल रहे थे तो आम लोग भी पूरे अनुशासन में रहकर उनका साथ दे रहे थे। युद्ध के दौरान लोग चौपालों पर नहीं रुके। दिन ढलते ही अंधेरे घरों में बैठ जाते थे। सरकार के हर आदेश का पालन किया जाता था।

सरकार के हर आदेश का पालन किया जाता था

1971 के युद्ध के दौरान सरकार के हर आदेश का पालन किया जाता था। गांवों में गांव के कोतवाल घरों में जाकर चिमनी या चूल्हा न जलाने की धमकी देते थे। युद्ध के दौरान जिस घर से सैनिक युद्ध में तैनात होता था, उसके परिवार के सदस्यों को प्रोत्साहित किया जाता था।

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