राजस्थान का सरहदी जिला जैसलमेर अपने अनूठे अतिथि सत्कार और मेहमानवाजी के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। यह जिला सिर्फ अपनी सुनहरी रेत और किलों के लिए ही नहीं, बल्कि यहां आज भी जीवित लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर के लिए जाना जाता है। जबकि आज का भागदौड़ भरा जीवन और आधुनिकता लोक संस्कृति को धीरे-धीरे लुप्त कर रही है, जैसलमेर के ग्रामीण अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं को संजोने में अग्रणी हैं।
जैसलमेर जिले के सरहदी क्षेत्रों के साथ ही कोटडी और खियां गांवों में ‘होली की गैर’ खेलने की प्राचीन परंपरा आज भी बरकरार है। यह परंपरा कई शताब्दियों पुरानी है और स्थानीय लोग इसे बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाते हैं। होली के अवसर पर इन गांवों का वातावरण रंग-बिरंगे उत्सव में बदल जाता है, जहां हर उम्र के लोग इस परंपरा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
‘गैर’ खेलने के दौरान पुरुष राजस्थानी वेशभूषा में सजते हैं। धोती-कुर्ता और पारंपरिक साफा पहनकर हाथों में डांडिया लेकर वे एक ताल पर झूमते हैं। डांडिया की थाप और ताल की गूंज गांव के हर कोने में सुनाई देती है। यह न केवल होली की खुशियों को दोगुना करती है, बल्कि ग्रामीण जीवन और सांस्कृतिक पहचान को भी जीवंत रखती है।
गैर की यह परंपरा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह सामूहिक एकता और भाईचारे का प्रतीक भी है। गांव के लोग इस अवसर पर अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों को एकत्रित करते हैं और होली के रंगों में आनंद विभाजित करते हैं। इसके अलावा, यह परंपरा युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम भी करती है।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि होली की गैर पहले सिर्फ गांव के युवा ही खेलते थे, लेकिन अब इस परंपरा में बच्चों और बुजुर्गों का भी उत्साहपूर्वक योगदान देखने को मिलता है। इस उत्सव के दौरान न केवल ग्रामीण बल्कि आसपास के पर्यटक भी इसे देखने आते हैं और राजस्थान की पारंपरिक संस्कृति का अनुभव करते हैं।
जैसलमेर के सरहदी गांवों में होली का यह उत्सव रंगों, संगीत और पारंपरिक नृत्य का अनूठा संगम है। यह परंपरा न केवल मनोरंजन का अवसर प्रदान करती है, बल्कि स्थानीय कला, संगीत और पहनावे को भी प्रदर्शित करती है। इस तरह, जैसलमेर की ‘गैर’ परंपरा आधुनिकता के दौर में भी अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए है।
यह दर्शाता है कि राजस्थान का यह सरहदी जिला न केवल अपने ऐतिहासिक और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं को भी संजोते हुए आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं।
जैसलमेर की होली की गैर आज भी यह संदेश देती है कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकते हैं, यदि हम अपने लोक संस्कृति के मूल्यों को बनाए रखें। इस प्रकार, जैसलमेर न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उदाहरण बनता जा रहा है।

