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जैसलमेर और जोधपुर के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर्स को नोडल अधिकारी बनाने का फरमान, सोशल मीडिया पर मचा हंगामा

जैसलमेर और जोधपुर के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर्स को नोडल अधिकारी बनाने का फरमान, सोशल मीडिया पर मचा हंगामा

हाल ही में राजस्थान सरकार के एक आदेश ने स्वास्थ्य क्षेत्र में हलचल मचा दी है। आदेश के तहत जैसलमेर और जोधपुर के सरकारी अस्पतालों में आवारा कुत्तों के रोकथाम के लिए डॉक्टर्स को नोडल अधिकारी बनाया गया है। इस खबर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर जैसे तहलका मच गया। लोगों ने इस फैसले पर अपनी चुटकियाँ और टिप्पणियाँ शुरू कर दीं, जबकि विपक्ष ने इसे सरकार की “ऐतिहासिक उपलब्धि” बताते हुए तंज कसा।

हालांकि, सरकार का कहना है कि यह कदम अस्पतालों में आवारा कुत्तों और अन्य जानवरों से उत्पन्न जोखिम को कम करने के लिए जरूरी है। अधिकारी इस कार्य के तहत न केवल जानवरों की समस्या का समाधान करेंगे, बल्कि अस्पताल परिसर में सफाई और सुरक्षा को भी सुनिश्चित करेंगे।

लेकिन जब बात अस्पतालों में डॉक्टर्स की वास्तविक भूमिकाओं की होती है, तो स्थिति और भी हैरान करने वाली बन जाती है। जयपुर के एसएमएस अस्पताल, जो प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल है, वहां की परिस्थितियां और भी चौंकाने वाली हैं। यहां लगभग दो दर्जन से अधिक डॉक्टर्स ऐसी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, जो परंपरागत रूप से उनके कार्यक्षेत्र से बिलकुल अलग हैं।

कुछ डॉक्टर्स किचन, कैंटीन और स्टेशनरी की व्यवस्था संभालते हैं। वहीं, कई ऐसे भी हैं जो सिक्योरिटी, लॉन्ड्री, हाउसकीपिंग और सीवरेज क्लिनिंग मैनेजमेंट की देखरेख कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति स्वास्थ्य क्षेत्र में गंभीर संसाधन और मानव शक्ति की कमी को दर्शाती है। डॉक्टर्स का असली काम मरीजों का इलाज करना और चिकित्सा सेवाओं में विशेषज्ञता प्रदान करना होना चाहिए, लेकिन अस्पतालों में उन्हें प्रबंधन और संचालन के ऐसे कार्य भी सौंप दिए गए हैं, जो उनकी पेशेवर भूमिका के बाहर हैं।

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर भारी बहस देखने को मिली। कुछ लोगों ने इसे सरकार की “रचनात्मक पहल” कहा, तो वहीं कई लोगों ने इसे स्वास्थ्य प्रशासन में गंभीर कमियों और प्राथमिकताओं में गड़बड़ी के रूप में पेश किया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डॉक्टर्स को इस तरह की गैर-चिकित्सा जिम्मेदारियां दी जाती रही, तो इसका सीधा असर मरीजों की देखभाल की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

विपक्ष ने इस आदेश का व्यंग्य करते हुए कहा कि अब अस्पताल में इलाज के साथ-साथ “कुत्ते पकड़ने और सफाई प्रबंधन” भी डॉक्टर्स के कंधों पर है। वहीं सरकार का तर्क है कि यह कदम अस्पताल परिसर और आसपास के इलाकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।

विश्लेषकों का कहना है कि राजस्थान जैसे बड़े राज्य में अस्पतालों के प्रबंधन और मरीजों की देखभाल के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है। डॉक्टर्स को गैर-चिकित्सा जिम्मेदारियां सौंपने से समस्या का असली समाधान नहीं निकलता, बल्कि यह अस्पताल प्रशासन की संरचनात्मक कमी को उजागर करता है।

इस पूरे मामले ने न केवल स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं, बल्कि सरकारी नीतियों और प्राथमिकताओं को लेकर भी जनता में जागरूकता बढ़ाई है। अब यह देखना बाकी है कि सरकार इस आदेश के प्रभाव और आलोचनाओं के मद्देनजर भविष्य में किस तरह के सुधार करती है।

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