राजनीति में नैतिकता और शुचिता को लेकर कुलिश जी का कथन आज भी उतना ही सटीक लगता है: “राजनीति में नीति-अनीति एकदम गौण हो जाती है।” स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लगातार मजबूत होने के बावजूद, राजनीतिक व्यवहार में नीति और नैतिकता की अपेक्षित भूमिका अक्सर नजरअंदाज होती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीति में नैतिकता और नीति का पालन तभी प्रभावी हो सकता है जब इसे केवल बोलचाल या नारेबाजी तक सीमित न रखा जाए। आज भी राजनीतिक दल और नेता जनता के सामने शुचिता और नीति के सिद्धांतों की बातें करते हैं, लेकिन उनके अमल और व्यवहार में अक्सर फर्क नजर आता है। इससे जनता के बीच विश्वास की कमी पैदा होती है और राजनीतिक प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।
कुलिश जी की बात का आज के समय में महत्व इस बात में निहित है कि भ्रष्टाचार, असमानता और राजनीतिक चालबाज़ी ने नीति और नैतिकता की उपेक्षा को बढ़ावा दिया है। सत्ता की प्रतिस्पर्धा में कई बार नीति-अनीति गौण हो जाती है और राजनीति केवल लाभ और ताकत के खेल तक सीमित रह जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में जनता की जागरूकता और राजनीतिक दलों में जवाबदेही ही ऐसे बदलाव ला सकते हैं। यदि राजनीतिक निर्णय और योजनाएं नीति और नैतिकता पर आधारित हों, तो केवल घोषणाएँ और भाषण ही नहीं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।
इतिहास में कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ नीति और नैतिकता का पालन करने वाले नेता समाज में स्थायी बदलाव ला सके। लेकिन वर्तमान समय में राजनीतिक घोषणाओं और प्रचार के पीछे व्यवहारिक अनुशासन की कमी कई बार उन्हें केवल दिखावा बना देती है।
कुलिश जी की इस टिप्पणी का आज भी प्रासंगिक होना यह दर्शाता है कि राजनीति और नैतिकता का संतुलन बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए न केवल नेताओं की जिम्मेदारी है, बल्कि जनता और मीडिया को भी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में भूमिका निभानी होगी।
अंततः, राजनीति में नीति-अनीति की उपेक्षा पर विचार करते हुए यह कहा जा सकता है कि आज भी कुलिश जी की बात उतनी ही सच है जितनी उनके समय में थी। केवल शब्दों में शुचिता की बातें करने से काम नहीं चलता; सचमुच के कार्य और अनुशासन ही लोकतंत्र और समाज के लिए स्थायी लाभ सुनिश्चित कर सकते हैं।

