नीरजा मोदी स्कूल की मान्यता रद्द करने पर CBSE का हाईकोर्ट में जवाब, फुटेज में जानें कहा— एंटी बुलिंग और पॉक्सो कमेटियां सिर्फ कागजों में थीं
जयपुर के नीरजा मोदी स्कूल की मान्यता रद्द किए जाने के मामले में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपना विस्तृत जवाब पेश किया है। करीब 170 पेज के जवाब में सीबीएसई ने स्कूल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बोर्ड ने कहा है कि स्कूल में एंटी बुलिंग कमेटी और पॉक्सो कमेटी केवल औपचारिकता तक सीमित थीं और धरातल पर कहीं भी सक्रिय रूप से काम नहीं कर रही थीं। यही लापरवाही एक मासूम बच्ची की जान जाने का कारण बनी।
सीबीएसई ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि स्कूल में छात्र सुरक्षा मानकों का गंभीर उल्लंघन हुआ है। बोर्ड के अनुसार, कक्षा 4 में पढ़ने वाली 9 वर्षीय छात्रा अमायरा पिछले करीब डेढ़ साल से लगातार एंटी बुलिंग का शिकार हो रही थी। इस दौरान बच्ची के अभिभावकों ने चार बार स्कूल प्रशासन से लिखित और मौखिक शिकायत की, लेकिन एंटी बुलिंग और पॉक्सो कमेटियों के निष्क्रिय रहने के कारण कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
सीबीएसई ने बताया कि स्कूल रिकॉर्ड में भले ही इन कमेटियों का गठन दिखाया गया हो, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर वे न तो नियमित बैठकें कर रही थीं और न ही शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो रही थी। बोर्ड ने इसे छात्रों की सुरक्षा के प्रति स्कूल की घोर लापरवाही बताया है। जवाब में कहा गया है कि यदि कमेटियां समय रहते सक्रिय होतीं और शिकायतों को गंभीरता से लिया जाता, तो शायद इस दुखद घटना को टाला जा सकता था।
गौरतलब है कि 1 नवंबर 2025 को छात्रा अमायरा ने स्कूल के चौथे फ्लोर से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था और निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए थे। मामले की जांच के बाद सीबीएसई ने स्कूल की मान्यता रद्द करने का निर्णय लिया था, जिसे स्कूल प्रबंधन ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
हाईकोर्ट में दायर जवाब में सीबीएसई ने कहा कि किसी भी स्कूल को तब तक संचालित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जब तक वहां बच्चों के लिए सुरक्षित और संवेदनशील माहौल सुनिश्चित न हो। बोर्ड ने दो टूक कहा कि ऐसे असुरक्षित वातावरण में बच्चों को पढ़ने की इजाजत देना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि यह बच्चों के मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।
सीबीएसई ने यह भी उल्लेख किया कि स्कूल प्रशासन ने केवल कागजी खानापूर्ति कर नियमों का पालन दिखाने की कोशिश की, जबकि वास्तविकता में सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल रही। बोर्ड के अनुसार, यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निजी शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
अब इस मामले में हाईकोर्ट को यह तय करना है कि सीबीएसई द्वारा की गई कार्रवाई को बरकरार रखा जाए या नहीं। वहीं, अमायरा के परिजन और सामाजिक संगठन इस मामले में कड़ी कार्रवाई और जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कदम की मांग कर रहे हैं। यह मामला शिक्षा व्यवस्था में छात्र सुरक्षा को लेकर एक अहम नजीर बन सकता है।

