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शिक्षा विभाग की बड़ी लापरवाही, वीडियो में देंखे 10 लाख नई किताबें बनीं रद्दी, सरकार को 7 करोड़ का नुकसान

शिक्षा विभाग की बड़ी लापरवाही, वीडियो में देंखे 10 लाख नई किताबें बनीं रद्दी, सरकार को 7 करोड़ का नुकसान

राजस्थान के शिक्षा विभाग में बड़ी लापरवाही का मामला सामने आया है, जहां सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए छपवाई गई करीब 10 लाख नई किताबें रद्दी में तब्दील हो गईं। इन किताबों के बेकार होने से सरकार को लगभग 7 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। सबसे ज्यादा प्रभावित सातवीं कक्षा की किताबें हैं, जिनकी संख्या करीब पांच लाख बताई जा रही है।जानकारी के अनुसार, नए शैक्षणिक सत्र में कक्षा सातवीं का पाठ्यक्रम बदल दिया गया। लेकिन विभागीय अधिकारियों ने पिछले सत्र के दौरान ही पुराना कोर्स होने के बावजूद बड़ी संख्या में किताबें एडवांस में छपवा दीं। बाद में सिलेबस बदलने के कारण ये किताबें उपयोग के लायक नहीं रहीं और पूरी खेप बेकार हो गई।

मामले का खुलासा तब हुआ जब नए सत्र के लिए स्कूलों में किताबों की सप्लाई की जा रही थी। इस दौरान नई किताबों के साथ सातवीं कक्षा की पुरानी किताबों के कुछ बंडल भी गलती से वितरण में पहुंच गए। जब स्कूल स्तर पर इन किताबों की जांच हुई तो पता चला कि इनमें पुराना पाठ्यक्रम छपा हुआ है।सूत्रों के मुताबिक, पुराने सिलेबस वाली किताबों को गोदामों में नई किताबों के पीछे छिपाकर रखा गया था ताकि इस लापरवाही की जानकारी उच्च अधिकारियों तक न पहुंचे। आरोप है कि विभाग के कुछ अधिकारियों ने पूरे मामले को दबाने की कोशिश भी की।

शिक्षा विभाग के इस मामले ने प्रशासनिक कार्यशैली और योजना निर्माण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पाठ्यक्रम परिवर्तन की प्रक्रिया स्पष्ट होने से पहले इतनी बड़ी संख्या में किताबों की छपाई कराना बेहद गैरजिम्मेदाराना फैसला था। इससे न सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी हुई बल्कि किताबों की सप्लाई व्यवस्था भी प्रभावित हुई।मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। विभागीय अधिकारियों से जवाब मांगा जा सकता है और पूरे मामले की जांच की संभावना भी जताई जा रही है। हालांकि अब तक किसी अधिकारी पर कार्रवाई की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए समय पर सही किताबें पहुंचाना विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। ऐसे में करोड़ों रुपए की किताबें रद्दी हो जाना प्रशासनिक विफलता का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।इस घटना ने सरकारी खरीद और प्रिंटिंग प्रक्रिया  पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेर सकते हैं। आने वाले दिनों में यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर और तूल पकड़ सकता है। फिलहाल विभाग अब नई किताबों की सप्लाई को व्यवस्थित करने में जुटा हुआ है ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो। लेकिन करोड़ों रुपए के नुकसान और अधिकारियों की लापरवाही को लेकर जवाबदेही तय होना अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

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