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इंदौर में चंदन नगर पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल, फुटेज में जानें बाप की जगह बेटे को 30 घंटे हिरासत में रखा

इंदौर में चंदन नगर पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल, फुटेज में जानें बाप की जगह बेटे को 30 घंटे हिरासत में रखा

मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में हाल ही में हुई एक कार्रवाई ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। Indore Police के तहत आने वाले Chandan Nagar Police Station द्वारा एक पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) केस में अभियुक्त की बजाय उसके इंजीनियर पुत्र को थाने में लगभग 30 घंटे हिरासत में रखा गया — जबकि जांच-पड़ताल में यह स्पष्ट हुआ कि बेटे की उस घटना में न तो कोई भाग-दारी थी और न ही वह आरोपी है।

पुलिस के अनुसार, चंदन नगर क्षेत्र के एक रियल एस्टेट कारोबारी संजय दुबे (62) पर एक नाबालिग लड़की ने शारीरिक शोषण और गर्भवती करने का आरोप लगाया था। इस पर पुलिस ने 12 नवम्बर को पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। 

लेकिन, पुलिस की कार्रवाई में हुई गंभीर चूक तब सामने आई जब दुबे के बेटे, एक अभियंता — जिसकी घटना से कोई लेना-देना नहीं था — को पुलिस थाने में हिरासत में लिया गया, हथकड़ी लगाई गई और लगभग डेढ़ दिन (30 घंटे) तक रखा गया। यह पूरी घटना सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से सार्वजनिक हुई।

हाईकोर्ट ने कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाया

इस घटना के विरोध में गिरफ्तार युवक की ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई। याचिका में पुलिस की इस कथित अवैध हिरासत और उत्पीड़न की कड़ी निन्दा की गई। घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए, अदालत ने कार्रवाई में शामिल थाना प्रभारी इंद्रमणि पटेल से उस 30 घंटे की हिरासत के दौरान रिकॉर्ड किया गया CCTV फुटेज मांग लिया है और उन्हें गुरुवार (4 दिसंबर) को कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया है। 

सवाल – क्या पुलिस ने जांच-प्रक्रिया में ठीक किया?

कानून और मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी आरोपी का बेटा — जो पूरी तरह से निर्दोष है — उसे हथकड़ी लगाकर थाने में रखकर पूछताछ करना, यह गिरफ्तारी नहीं, बल्कि अवैध बंदी बनामता (illegal detention) है। ऐसा करना अपराध-निरीक्षण के नाम पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो सकता है।

किसी भी यौन अपराध, विशेषकर पॉक्सो जैसे मामलों में पुलिस की संवेदनशीलता बेहद महत्वपूर्ण होती है। अभियुक्त और उसके परिवार में गलत व्यक्ति को हिरासत में लेना न सिर्फ मुआवजे के दावों को जन्म दे सकता है, बल्कि आम जनमानस में पुलिस पर भरोसा भी डिगा सकता है।

मामले की संवेदनशीलता और आगे की कार्रवाई

चूंकि मामला एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण का है, इसलिए पुलिस को चाहिए था कि वह आरोपी की गिरफ्तारी में सावधानी बरते और जरूरी जांच-पड़ताल के बाद कार्रवाई करे। लेकिन आरोपी के बजाय उसके पुत्र को हिरासत में लेना — वह भी बिना किसी ठोस सबूत के — न्यायिक प्रक्रिया के विरुद्ध है।

अब Madhya Pradesh High Court (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय) ने इस मामले में मज़बूत रुख दिखाया है। कोर्ट द्वारा CCTV फुटेज तलब करना यह संकेत है कि वह मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही चाहती है। संभव है कि कोर्ट पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दे — और यदि आवश्यक हुआ, तो मामले की पुनः जाँच भी हो।

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