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पंचायत भवन निर्माण में अनियमितता पर हाईकोर्ट सख्त, फुटेज में जानें सिकराय SDM और दोषी अधिकारियों पर एक-एक लाख का जुर्माना

पंचायत भवन निर्माण में अनियमितता पर हाईकोर्ट सख्त, फुटेज में जानें सिकराय SDM और दोषी अधिकारियों पर एक-एक लाख का जुर्माना

पंचायत भवन निर्माण के लिए बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति और निर्धारित संख्या से अधिक पेड़ों की कटाई को राजस्थान हाईकोर्ट ने गंभीर लापरवाही मानते हुए कड़ा रुख अपनाया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा और न्यायमूर्ति संगीता शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में तत्कालीन दौसा जिले के सिकराय उपखंड अधिकारी (एसडीएम) सहित अन्य दोषी अधिकारियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने यह आदेश विमला देवी द्वारा दायर जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए पारित किया।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि पंचायत भवन के निर्माण के लिए बिना सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लिए और निर्धारित मानकों की अनदेखी करते हुए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई कर दी गई। नियमों के अनुसार सार्वजनिक निर्माण से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति और सीमित संख्या में ही पेड़ों को काटने की अनुमति दी जाती है, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने इन नियमों का पालन नहीं किया। इसे गंभीर प्रशासनिक चूक मानते हुए हाईकोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित करने का निर्णय लिया।

खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि लगाए गए जुर्माने की राशि सरकारी कोष से नहीं, बल्कि सीधे उन अधिकारियों से वसूली की जाए जो पेड़ों की अवैध कटाई में शामिल पाए गए हैं। अदालत ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे मामलों में व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय हो, ताकि भविष्य में अधिकारी नियमों की अनदेखी करने से बचें।

अदालत ने अपने महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि सार्वजनिक उपयोग के लिए भवनों का निर्माण आवश्यक हो सकता है और ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत भवन प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं। हालांकि, इसके साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए लगाए गए वृक्षों की रक्षा की जाए। बिना वैध अनुमति पेड़ों की कटाई न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करती है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज केवल एक नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। संविधान के अनुच्छेद 48ए और 51ए के तहत राज्य और नागरिकों दोनों पर पर्यावरण की रक्षा और सुधार की जिम्मेदारी है। ऐसे में सरकारी अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कानून और पर्यावरणीय मानदंडों का सख्ती से पालन करें।

जनहित याचिकाकर्ता विमला देवी की ओर से अदालत को बताया गया कि पेड़ों की कटाई से स्थानीय पर्यावरण को नुकसान पहुंचा है और क्षेत्र में हरित आवरण कम हुआ है। अदालत ने इस चिंता को गंभीरता से लेते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के आदेश न केवल अधिकारियों को जवाबदेह बनाते हैं, बल्कि भविष्य में अवैध रूप से पेड़ काटने जैसी गतिविधियों पर भी रोक लगाने में मदद करेंगे। हाईकोर्ट का यह फैसला विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करता है।

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